गरीबों की कोई सुनवाई नहीं

कानपुर। बर्रा थानाक्षेत्र निवासी फैक्ट्री कर्मी विनोद द्विवेदी उर्फ प्रमोद के घर पर बर्रा पुलिस दस्तक देती है। खाकी को देख वह डर जाते हैं। पुलिस उन्हें बताती है कि आप हिस्ट्रीशीटर हैं। से सुन उसके पैरों के तले से जमीन खिसक जाती है। पीड़ित थाने के साथ पुलिस के बड़े-बड़े अफसरों की चौखट पर फरियाद करता है, पर उसे न्याय नहीं मिलता। पुलिस की किताब में अपराधी बना प्रमोद पर शांतिभंग की कार्रवाई भी हो जाती है। जिससे आहत होकर वह धरने पर बैठने का ऐलान कर देता है।
विनोद मुलरूम से कानुपर देहाज के रसूलाबाद थाना क्षेत्र के इकघरा के रहने वाले हैं। वह फैक्ट्री में काम कर अपने परिवार का पेट पालते हैं। विनोद बताते हैं कि, उनका गांव पहले ककवन थाना क्षेत्र में आता था। बताया, पिता गंगाराम साधन सहकारी समिति में प्रशासक थे। 2 फरवरी 1984 को ककवन बाबापुर के कनपटियापुर गांव निवासी बाबूलाल के घर में घुसकर लूटपाट और हत्या के मामले में मुझे, मेरे पिता गंगाराम, शशिकांत, पप्पू पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया था। उस वक्त मेरी उम्र महज 16 साल की थी। पुलिस ने मृतक की पत्नी से शिनाख्त परेड कराई तो उन्होंने उसे नहीं पहचाना।
पुलिस ने मामले की जांच के बाद 1987 में कोर्ट में चार्जशीट दाखिल कर दी। पुलिस ने विवेचना में मेरा नाम हटा दिया था। कोर्ट में चले मुकदमे में न्यायाधीश ने हमारे पक्ष पर फैसला सुनाते हुए सभी को दोषमुक्त कर दिया था। विनोद ने बताया कि, ककवन पुलिस ने 1995 में बिना जांच पड़ताल किए उसकी हिस्ट्रीशीट 0054 ए खोल दी।
विनोद ने बताया कि, नए परिसीमन में उसका गांव ककवन से कानपुर देहात के रसूलाबाद थाना क्षेत्र में चला गया तो हिस्ट्रीशीट भी वहीं भेज दी गई। मैं रोजगार के लिए गांव से भागकर कानपुर के बर्रा इलाके में रहने लगा। रसूलाबाद पुलिस ने तत्काल मेरी हिस्ट्रीशीट बर्रा थाने भेज दी। विनोद ने बताया कि उसे एक साल तक इसके बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई।
विनोद ने बताया कि, 1996 जब बर्रा पुलिस उनके घर पहुंची तो उन्हें खुद के हिस्ट्रीशीटर होने का पता चला। विनोद के मुताबिक उसने पुलिस को लाख सफाई दी, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। यही नहीं पुलिस ने अप्रैल 2019 में उनके खिलाफ शांतिभंग की कार्रवाई भी कर दी। 50 हजार का बांड भरने के साथ एसीएम प्रथम के यहां से जमानत करानी पड़ी।
विनोद ने बताया कि मुख्यमंत्री कार्यालय में शिकायत पर उनकी समस्या आइजीआरएस पोर्टल अपलोड की गई थी। ककवन पुलिस ने जवाब लिखा कि इकघरा गांव रसूलाबाद थाने में समायोजित हुआ है। वांछित आख्या थानास्तर पर मिलना संभव नहीं है। तत्कालीन सीओ रसूलाबाद ने भी बिना पड़ताल के जांच रिपोर्ट लगा दी। सीओ ने उन्होंने अपनी जांच रिपोर्ट में वर्ष 1984 में हुई हत्या को वर्ष 2000 की बताई है। बर्रा पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि विनोद पर कोई मुकदमा पंजीकृत नहीं है। मगर वह हिस्ट्रीशीटर क्यों है, इस पर बर्रा पुलिस ने भी चुप्पी साध ली।
विनोद के मुताबिक तत्कालीन डीआइजी अनंतदेव तिवारी के कार्यकाल में शासन के आदेश पर निष्क्रिय हो चुके अपराधियों की हिस्ट्रीशीट उनके आचरण, उम्र आदि को देखते हुए समाप्त की गई थीं। बर्रा पुलिस ने थाने के हिस्ट्रीशीटर रहे संदीप ठाकुर की हिस्ट्रीशीट तो खत्म कर दी, मगर उसके बारे में कोई कदम नहीं उठाया, जबकि उस पर एक भी मुकदमा नहीं है। संदीप भाजपा नेता थे तो काम हो गया, गरीबों की कोई सुनवाई नहीं है।

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