बताते चलें कि स्टेशन के बाहर गेट नम्बर 2 पर लगभग 5 बजे सुबह चाय के ठेला जीआरपी के इंस्पेक्टर ने पटरी पर दुकान लगाने वाले दुकानदारों को काफ़ी देर गाड़ी में बैठाए रखा।
छोटी छोटी दुकान लगा कर अपना भरनपोषण करने वाले दुकानदारों को जीआरपी पुलिस ने अपना शिकार बना लिया और दुकानदारों को गाड़ी में बैठा कर साथ ले गए स्टेशन के अंदर चल रहे अवैध वेंडरों से मिलने वाली बड़ी रकम के चलते मानकों कि सेहत से खिलवाड़ किया जा रहा है उन लोगो को रोकने के बजाए चाय का ठेला लगाने वाले दुकानदारों को अपना शिकार बना रहे।
सवाल यह उठता है कि स्टेशन के अंदर चल रहा अवैध कारोबार इं लोगो को नज़र नहीं आता ।
सबसे बड़ी बात यह है कि ये चोट दुकानदार महीना भी देते है और फ्री की चाय व अन्य खाने पीने को भी पुलिस को देते है।
आखिर कब इन छोटे दुकानदारों को जीने का अधिकार मिलेगा और कब ये धांधली बंद होगी।
कब गरीब खुशी से अपना व्यवसाय कर पाएंगे आखिर इनका जुर्म क्या है।
क्या वर्दी में मानवता खत्म हो गई है।
कहने को तो हमारा देश कई वर्ष पहले आजाद हो चुका है लेकिन यह सब देखने से साफ़ दिखता है कि इन वर्दीधारियों से अंग्रेज़ो की गुलामी अच्छी थी।
