वर्तमान सरकार का मूल मंत्र सर्वशिक्षा अभियान इन दिनों कई माता पिता के लिए टीस बन गई है। सरकारी स्कूलों मे असुविधा को देखते हुए समाज मे ऐसे कई परिवार है जो अपने बच्चो को इंग्लिश स्कूलों मे भेजने को विवश है इसी बात का फायदा उठाते हुए प्राइवेट स्कूलों मे शिक्षा के नाम पर व्यवसाय किया जा रहा है हर स्कूल के अपने नए नियम है किसी की किताबे अलग है किसी की ड्रेस अलग है कोई टाई लगवाता है कोई हाफ पैंट पहनाता है किताबे भी विभिन्न प्रकार और हर चीज का दाम लगभग दस गुना ज्यादा ऐसे में अभिवावको की जेब मे अप्रत्यक्ष रूप से लूट की जा रही है। करोना काल के खत्म होते ही फीस की टेंशन के साथ साथ नई किताबो का बोझ भी बढ़ गया हर स्कूल कि अपनी अलग ही तरीके की किताबे छपवाई जाती है जहां शिक्षा मिलनी चाहिए वहां अब दुकानों की तर्ज पर किताबे कॉपी टाई बेल्ट मनमाने दामों मे बेची जाती है एक और बात आई कार्ड के नाम पर भी उगाही की जाती है।
अब शिक्षा के मंदिरों ने ब्यावसायिक स्थलों का रूप ले लिया है यही कारण है जिसकी वजह से कई परिवार अपनी आय से अधिक पैसा पढ़ाई पर खर्च करने को मजबूर है। कई परिवारों से संपर्क करने पर ज्ञात हुआ जो किताबे वर्तमान साल मे पढ़ाई जाती है उसी कक्षा की किताबे अगले वर्ष बदल दी जाती है यानी यदि किसी का बच्चा कक्षा पांच में पढ़ता है और पास होकर कक्षा छय मे पहुंचता है तो गत वर्ष की पांच की किताबे आने वाले कक्षा चार के बच्चे नही पढ़ सकते क्योंकि कक्षा पांच का सिलेबस बदल दिए जाता है और ये केवल किताबो की बिक्री के लिए किया जाता है जबकि अमेरिका जैसे देशों मे ऐसा नही होता वहां इस वर्ष किताबे पिछली क्लास से आने वाले बच्चे के काम आ जाती है और हां किताबे प्लास्टिक से बनी होती है जो काफी समय तक रखी जा सकती है आखिर हमारे देश मे ऐसी प्लास्टिक किताबो का निर्माण क्यों नहीं होता प्लास्टिक की किताबो के चलन से कागज की काफी बचत की जा सकती है और प्लास्टिक किताबो की कीमत कागज की किताबो से कम रखी जा सकती है। सरकार को प्राइवेट स्कूलों और सरकारी स्कूलों के पाठ्यक्रम एक जैसे करने होंगे व फीस भी निर्धारित करनी होगी तभी सर्वशिक्षा अभियान को सफल बनाया जा सकता है।
2022-04-08
