एक दिन महादेव के मेखल पर्वत पर जाने के बाद देवी पार्वती का जब मन नहीं लगा तो वो भ्रमण के लिए देव वन चली गयी. वहां उनके मन में एक पुत्री पाने की अभिलाषा जागी और कल्प वृक्ष ने उनकी इच्छा पूरी करते हुए उन्हें एक पुत्री प्रदान कर दी जिसका नाम अशोक सुंदरी रखा गया. अशोक सुंदरी अपनी माँ के साथ कैलाश आ गयी और वहीँ रहते हुए माँ की सेवा करने लगीं. पुत्री की सेवा से प्रसन्न होकर देवी पार्वती ने अपनी पुत्री को वरदान दिया कि उसका विवाह देवराज इंद्र जैसे एक पराकर्मी वीर पुरुष के साथ होगा.

 

लेकिन इसके कुछ दिनों बाद एक असुर हूंड की नज़र अशोक सुंदरी पर पड़ी और वो उसे पाने के लिए लालायित हो उठा. हूंड अब हमेशा अशोक सुंदरी को परेशान करने लगा जिसके परिणाम स्वरुप अशोक सुंदरी ने भी उस असुर हूंड को श्राप दे दिया कि उसका वध उसका होने वाला पति ही करेगा. अब अशोक सुंदरी के श्राप से परेशान हूंड उस व्यक्ति को ढूंढना लगा जो अशोक सुंदरी का वर होने वाला था. इसी बीच अशोक सुंदरी की भेंट युवराज नाहुष से हुई और दोनों को एक दुसरे से प्रेम हो गया. उस समय युवराज नाहुष एक युवक ही थे. असुर हूंड को जैसे ही पता चला कि अशोक सुंदरी को वो होने वाला पति युवराज नाहुष ही है तो हूंड ने नाहुष को बंदी बनाकर एक गुफा में कैद कर दिया. मगर नाहुष वहां से बच कर भाग निकला और जाकर उसने वशिस्ठ ऋषि के पास सभी तरह के अस्त्र- शस्त्रों की शिक्षा ग्रहण करनी शुरू कर दी. इस बीच असुर हूंड अपनी मौत यानी की नाहुष को ढूंढता रहा. मगर वो नाहुष से तब टकराया जब नाहुष पूरी तरह से एक वीर योद्धा बन चुका था. नाहुष ने उस असुर का वध कर अशोक सुंदरी के साथ विवाह किया.[1]

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