
डंडा टेकर चला रहे चौराहे
बाधित यातायात व्यवस्था से जूझता
कानपुर नगर, यातायात व्यवस्थित करना कानपुर शहर के लिए एक बड़ी चुनौती है और इस चुनौती को प्राथमिकता से ना लेना संबंधित विभागों की कार्यशैली पर प्रश्न चिन्ह लगाता है। एक तरफ शहर को स्मार्ट सिटी बनाने की कवायद में प्रशासन जी जान से लगा है वहीं दूसरी तरफ देखने को मिल रही है अराजकता। कानपुर शहर को अन्य शहरों से जोड़ने वाले राजमार्गों व चौराहों पर अमर्यादित यातायात व्यवस्था देखी जा सकती है चौराहों पर बेलगाम खड़े ऑटो, ई रिक्शा जो कभी भी सवारी उतारने व बैठाने के लिए खुद को आजाद समझते हैं उनके लिए विभागों द्वारा बनाए गए नियम व कानून शायद मायने नहीं रखते, मायने रखता है तो सिर्फ वह आदमी जो दस रुपए लेकर पूरा चौराहा उनके नाम कर देता है इन्हें चौराहे का ठेकेदार कह सकते हैं। जी हां मैं बात कर रहा हूं डंडा टेकरों की, जो प्रति ई रिक्शा दस व ऑटो से बीस रुपए तक वसूलते हैं। उसके बाद शुरू होता है बंदर बांट। शहर के कई चौराहे डंडा टेकारों के कंट्रोल में है प्रतिदिन की वसूली औसतन 2500 से 5000 रुपए तक की जाती है जिसका एक हिस्सा उस समिति के पदाधिकारी को जाता है जो डंडा टेकरों को यह अधिकार देते हैं कि हम तुम्हारे पीछे खड़े हैं तुम खुलकर वसूली करो और जो ना दे उसकी गाड़ी का चालान व सीज की कार्यवाही करवाना यह हमारे बाएं हाथ का खेल है। यातायात पुलिस कर्मियों व क्षेत्रीय थानों को पहुंचाते है वसूली का कुछ हिस्सा। जिस कारण यातायात कर्मियों व क्षेत्रीय थाने को मूकबधिर के रूप में देखा जा सकता है।
कानपुर शहर के कुछ चौराहों की अगर बात करें, जहां डंडा टेकरों को अधिकार के साथ वसूली करते देखा जा सकता है। वे है घंटाघर, रामादेवी, बड़ा चौराहा , रावतपुर, कल्याणपुर, विजय नगर, बर्रा बाई पास एवं नौबस्ता। यातायात पुलिस कर्मियों की ढिलाई और क्षेत्रीय थानों का संरक्षण साफ प्रतीत होता है।
