क़ुरान सिर्फ़ पढ़ने के लिए नहीं, समझने और अमल करने के लिए भी है – सय्यद हम्मादुल हसन चिश्ती
कानपुर,1500वें जश्न ए विलादत हज़रत मोहम्मद रहमतुल्लिल आलमीन पर विशेष
इस्लाम धर्म के लोग ईद मिलाद उन नबी को पैगंबर साहब के जन्मदिन के रूप में हर साल मनाते हैं और हर साल यह ये त्योहार इस्लाम के तीसरे महीने रबी उल अव्वल के 12वें दिन मनाया जाता है। इस साल यह दिन इसलिए भी बेहद खास है कि यह अल्लाह के महबूब की विलादत का 1500 वाँ साल है। भारत समेत पूरी दुनिया में यह त्योहार आज मनाया जा रहा है। इस दिन को मुसलमान लोग जुलूस निकालकर मनाते हैं, यह उत्सव मुहम्मद साहब के जीवन और उनकी शिक्षाओं की भी याद दिलाता है।
ऐसे हुई जश्न की शुरुआत ऐतिहासिक ग्रंथों के अनुसार, मुहम्मद साहब का जन्म सन् 570 में सऊदी अरब के मक्का शहर में हुआ था। अपने जीवनकाल के दौरान, मुहम्मद साहब ने इस्लाम धर्म की स्थापना की, जो सिर्फ़ अल्लाह की इबादत के लिए समर्पित है। सन् 632 में पैगंबर मुहम्मद साहब के 62 वर्ष की उम्र में विसाल के बाद, कई मुसलमानों ने विविध अनौपचारिक उत्सवों के साथ उनके जीवन और उनकी शिक्षाओं का जश्न मनाना शुरू कर दिया। हिजरी सन, आका की उम्र के 52 वें साल मक्का से मदीना शहर जाने के हिजरत के सफर से शुरू हुआ। आपका सारा जीवन मानवता, इन्साफ़ के लिए समर्पित रहा।हज़रत मोहम्मद के जन्मोत्सव की 1500 वीं वर्षगांठ पर पीर साहब अपने वालिद ए गिरामी के नक्शे कदम पर, जिस तरह से पहले उनके वालिद फ़रीद अल-मशाइख़ हज़रत मौलाना सैयद फ़रीदुल हसन चिश्ती (रहमतुल्ला अलेह) ने उनके मिशन को आगे बढ़ाया, उसी तरह अब उनके जाँनशीन हज़रत मौलाना पीर सैयद हम्मादुल हसन चिश्ती, साहब क़िबला भी उनके मिशन और उद्देश्यों को पूरा करने के लिए महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं।
इसी क्रम में पीर साहब ने आलम ए इस्लाम को संबोधित करते हुए मोहम्मद साहब के उपदेशों की जानकारी देते हुए कहा कि दुनिया की ज़िंदगी छोटी है, आख़िरत के लिए तैयारी करो। हर मुश्किल के बाद आसानी है, ये अल्लाह का वादा है, इस पर यक़ीन रखो। क़ुरआन सिर्फ़ पढ़ने के लिए नहीं, समझने और अमल करने के लिए भी है। नमाज़ कभी मत छोड़ो, यही तुम्हें दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाबी देगा। याद रखें अगर आपका पड़ोसी भूखा सो गया तो आपका खाना हराम है। अपने पड़ोसी का ख्याल रखे। इस मुबारक महीने में गुनाहों से तौबा करें और नेक कामों को करने की आदत बनायें। हुज़ूर के अख़लाक़ को अपनाएं, लोगों से नर्मी और मोहब्बत से पेश आएं। ग़रीबों और मज़लूमों का ख्याल रखें, उनकी मदद करें। लड़ाई-झगड़े के बजाय मोहब्बत और भाईचारे को बढ़ावा दें। ऐसी रस्मों से परहेज़ करें जो दीन में मौजूद नहीं, सिर्फ़ वही अमल करें जो क़ुरआन और सुन्नत से साबित हों। हुज़ूर की सीरत और पैग़ाम को दूसरों तक पहुँचाना हमारी ज़िम्मेदारी है। इनके साथ ही साथ अपने वालिदैन की ख़िदमत करें उनके फरमा बरदार बने। हर मोमिन एक दूसरे का भाई है। आपने सगे भाइयों का खास ख्याल रखें। इस मौके पर इस्लाम जगत को अजमेर स्थित खानकाह आलिया मशरिब चिश्त, हुज़ूर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के जन्म की 1500वीं वर्षगांठ पर हार्दिक बधाई देता है।
शाह हम्माद की सरबराही में अब, फल-फूल रहा मशरब ए चिश्त है।
