*कृषक परिवारों के लिए राहत भरे फैसलों का रहा वर्ष*

 

 

*457 परिवारों तक पहुँची राहत, मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना में एक अप्रैल से अब तक 22.85 करोड़ का भुगतान*

 

*सिर्फ नए नहीं, पुराने जख़्म भी भरे वर्षों से लंबित 15 प्रकरणों का डीएम कोर्ट से निस्तारण, दिलाया मुआवजा*

 

*चार साल में चौगुने से ज्यादा असर, 105 से बढ़कर 457 तक पहुँचे लाभार्थी*

 

*सतत निगरानी से बदली तस्वीर लोगों को मिली राहत*

 

कानपुर नगर।

 

मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना इस वर्ष जनपद में सिर्फ राहत वितरण की योजना नहीं रही, बल्कि वर्षों से लंबित, उलझे और तकनीकी आपत्तियों में फंसे मामलों के लिए न्याय की प्रक्रिया बनी। वित्तीय वर्ष 2025-26 में एक अप्रैल से अब तक 457 प्रकरणों में 22.85 करोड़ रुपये की सहायता राशि उपलब्ध कराई जा चुकी है। इनमें 15 ऐसे प्रकरण शामिल हैं, जो कई वर्षों से लंबित थे और जिनका निस्तारण जिलाधिकारी न्यायालय में विस्तृत सुनवाई के बाद किया गया।

 

पिछले चार वर्षों के आंकड़े योजना के बढ़ते दायरे और प्रभाव को दर्शाते हैं। वर्ष 2021-22 में 105 आवेदकों को 5.25 करोड़ रुपये, 2022-23 में 167 आवेदकों को 8.35 करोड़ रुपये, 2023-24 में 231 आवेदकों को 11.55 करोड़ रुपये और 2024-25 में 275 लाभार्थियों को 13.75 करोड़ रुपये की सहायता दी गई थी। इस वर्ष की विशेषता यह रही कि नए मामलों के साथ-साथ उन प्रकरणों को भी प्राथमिकता दी गई, जो लंबे समय से तकनीकी कारणों से लंबित थे।

 

जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह ने इन मामलों के लिए एक विशेष मैकेनिज्म विकसित किया, जिसमें बीमा कंपनियों के निर्णय, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, एफआईआर, तिथियों की गणना और योजना के अनुबंध की शर्तों की बिंदुवार समीक्षा की गई। प्रत्येक प्रकरण में यह देखा गया कि दावा वास्तव में कब प्रस्तुत किया गया और देरी किस स्तर पर हुई।

 

 

जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना का उद्देश्य केवल आर्थिक सहायता देना नहीं है, बल्कि दुर्घटना से प्रभावित परिवारों को समय पर न्याय और भरोसा देना भी है। ऐसे प्रकरणों में जहां तकनीकी कारणों या प्रशासनिक देरी से दावे लंबित रह गए थे, उनकी व्यक्तिगत सुनवाई कर वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर निर्णय लिया गया। यह सुनिश्चित किया गया कि किसी भी पात्र परिवार का अधिकार केवल फाइल या तारीख़ की वजह से न छूटे। शासन की मंशा के अनुरूप योजना का प्रभावी और संवेदनशील क्रियान्वयन प्राथमिकता रहेगा।

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*मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना योजनांतर्गत जिलाधिकारी न्यायालय द्वारा दिये गए फैसलों से मिली राहत*

 

*केस 1 | रोटी कमाने वाला हाथ देखा गया, नाम नहीं*

 

27 फरवरी 2017 को एक सड़क दुर्घटना ने वीरबल का सहारा छीन लिया। पत्नी शशि देवी की मौत सिर्फ एक हादसा नहीं थी, बल्कि पूरे परिवार की रीढ़ टूटने जैसा था। वीरबल स्वयं 100 प्रतिशत नेत्रहीन हैं। घर चलाने की पूरी जिम्मेदारी शशि देवी के कंधों पर थी। मजदूरी और खेती करके वह न सिर्फ पति, बल्कि दो अविवाहित बेटियों और एक बेटे का पालन-पोषण कर रही थीं। उन्होंने योजना के तहत दावा समय पर किया, लेकिन बीमा कंपनी ने खतौनी में दर्ज नाम को आधार बनाकर यह कह दिया कि शशि देवी को परिवार का रोटी अर्जक नहीं माना जा सकता। कागज़ों के आधार पर ज़मीनी सच्चाई को नज़रअंदाज़ कर दिया गया।

मामला माननीय उच्च न्यायालय पहुँचा। अदालत के निर्देश पर जिलाधिकारी कानपुर नगर की अध्यक्षता में जिला स्तरीय समिति ने सुनवाई की। जांच में स्पष्ट हुआ कि नेत्रहीन पति के बावजूद परिवार शशि देवी की कमाई से ही चल रहा था। समिति ने माना कि बीमा कंपनी ने मानवीय संवेदना और प्राकृतिक न्याय की अनदेखी की। अंततः जिलाधिकारी ने निर्णय दिया कि कागज़ नहीं, जीवन की वास्तविकता देखी जाएगी। वीरबल के पक्ष में फैसला हुआ और पाँच लाख रुपये मुआवजा स्वीकृत किया गया।

 

*केस–2*

 

*वर्षों बाद मिला न्याय, एक माँ को मिला भरोसा*

 

करीब सात साल पहले सड़क दुर्घटना में बेटे को खो चुकी रूपरानी उसी दिन के दर्द के साथ जी रही थीं। बेटा रमाकान्त परिवार का एकमात्र सहारा था। उसकी अचानक हुई मृत्यु के बाद जीवन जैसे ठहर गया। उम्मीद बस एक थी मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना योजना के तहत मिलने वाली सहायता, जिससे किसी तरह घर चल सके। दावा समय पर किया गया, सभी कागज़ पूरे थे, लेकिन बीमा कंपनी ने केवल पोस्टमार्टम रिपोर्ट में लिखे ‘स्मेल ऑफ अल्कोहल’ के आधार पर मुआवजा देने से इनकार कर दिया। न रक्त में अल्कोहल की मात्रा दर्ज थी, न यह साबित कि दुर्घटना नशे के कारण हुई। इसके बावजूद फाइल बंद कर दी गई। एक गरीब विधवा के लिए न्याय का रास्ता यहीं रुक गया। इसके बाद हाई कोर्ट के निर्देश पर जिलाधिकारी कानपुर नगर ने पूरे प्रकरण की सुनवाई की। जिला स्तरीय समिति के समक्ष सभी पक्ष रखे गए। वैज्ञानिक और चिकित्सीय तथ्यों का परीक्षण हुआ। यह स्पष्ट हुआ कि बिना ठोस प्रमाण के दावा खारिज किया गया था। जिलाधिकारी ने संवेदनशीलता और विधिसम्मत दृष्टि से निर्णय लिया। वर्षों से भटक रही एक माँ के पक्ष में फैसला हुआ। अंततः रूपरानी को पाँच लाख रुपये का मुआवजा स्वीकृत किया गया।

 

*केस-3 | फाइल की देरी, इंसाफ की नहीं*

 

अनीता देवी के लिए 22 मार्च 2019 की सुबह कभी खत्म नहीं हुई। सड़क दुर्घटना में पति दिनेश कुमार उर्फ राजू की मौत ने पूरा जीवन एक झटके में बदल दिया। वही घर के मुखिया थे, वही कमाने वाले। पति के जाने के बाद जिम्मेदारियों का बोझ और भविष्य की चिंता, दोनों एक साथ आ खड़े हुए।

 

मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना योजना के तहत मुआवजे की उम्मीद थी। अनीता देवी ने तय समय के भीतर, 16 अप्रैल 2019 को अपना दावा प्रस्तुत कर दिया। लेकिन यह फाइल बीमा कंपनी तक समय से नहीं पहुँची। नतीजा यह हुआ कि इंश्योरेंस कंपनी ने “दावा देर से प्राप्त होने” का हवाला देकर भुगतान से इनकार कर दिया। गलती परिस्थितियों की थी, सज़ा एक विधवा को मिल रही थी।

 

मामला माननीय उच्च न्यायालय पहुँचा। अदालत के निर्देश पर जिलाधिकारी कानपुर नगर ने पूरे प्रकरण की सुनवाई की। जिला स्तरीय समिति के सामने तथ्य रखे गए। जांच में साफ हुआ कि दावा समय पर किया गया था, देरी फाइल के आगे बढ़ने में हुई थी। इस आधार पर दावा खारिज करना न तो न्यायसंगत था, न ही विधिसम्मत। जिलाधिकारी ने स्पष्ट और संवेदनशील निर्णय लिया। अनीता देवी को योजना के तहत पात्र माना गया और पाँच लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश पारित हुआ।

 

 

*केस 4 | तारीख़ नहीं, माँ की मजबूरी देखी गई*

 

सुरेखा के बेटे राहुल कुमार की मृत्यु के बाद दावा इस आधार पर निरस्त किया गया कि अवधि समाप्त हो चुकी थी।

 

जिलाधिकारी न्यायालय में यह तथ्य सामने आया कि दावा निर्धारित अवधि के भीतर प्रस्तुत किया गया था और तकनीकी जानकारी के अभाव में पीड़ित को दंडित नहीं किया जा सकता। मानवीय और विधिसम्मत दृष्टिकोण अपनाते हुए दावा स्वीकार किया गया।

 

*केस 5 | तारीख़ों के भ्रम में उलझा दावा, सच के आधार पर डीएम ने दिलाया हक़*

 

सुमन देवी के मामले में बीमा कंपनी ने चार माह की सीमा का हवाला देकर दावा निरस्त किया।

 

जिलाधिकारी न्यायालय में तहसील स्तर की आख्या और कार्यालयी रसीदों से यह स्पष्ट हुआ कि सभी दस्तावेज़ समय से प्रस्तुत किए गए थे और बीमा कंपनी तक फाइल बाद में पहुँचना दावाकर्ता की गलती नहीं थी। इस आधार पर पाँच लाख रुपये की सहायता स्वीकृत की गई।

 

इन प्रकरणों ने यह स्पष्ट कर दिया कि मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होता है, जब योजनाओं को तकनीकी आपत्तियों से मुक्त कर पीड़ित की वास्तविक स्थिति के आधार पर लागू किया जाए। जिलाधिकारी न्यायालय से आए इन फैसलों ने यह भरोसा दिया है कि प्रशासनिक प्रक्रिया अगर संवेदनशील हो, तो वर्षों से रुके न्याय को भी रास्ता मिल सकता है।

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*डेटा बॉक्स*

*मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना*

 

*कानपुर नगर : सहायता वितरण का आंकड़ा*

 

वित्तीय वर्ष | लाभार्थी | सहायता राशि

 

*2021–22*

105 लाभार्थी

₹ 5.25 करोड़

 

*2022–23*

167 लाभार्थी

₹ 8.35 करोड़

 

 

*2023–24*

231 लाभार्थी

₹ 11.55 करोड़

 

*2024–25*

275 लाभार्थी

₹ 13.75 करोड़

 

*वर्तमान वित्तीय वर्ष 2025-26(1 अप्रैल से अब तक)*

457 प्रकरण

₹ 22.85 करोड़

 

 

*विशेष तथ्य*

• वर्षों से लंबित 15 प्रकरणों का निस्तारण जिलाधिकारी न्यायालय से

• प्रत्येक प्रकरण की व्यक्तिगत सुनवाई

• प्रशासनिक देरी और तकनीकी आपत्तियों को मानवीय दृष्टि से परखा गया

 

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*क्या है योजना*

 

मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना उत्तर प्रदेश सरकार की जनकल्याणकारी योजना है, जिसका उद्देश्य दुर्घटना में मृत्यु या स्थायी अपंगता की स्थिति में कृषक परिवार को आर्थिक सहायता देना है। योजना के अंतर्गत 18 से 70 वर्ष आयु के ऐसे कृषक पात्र हैं, जिनका नाम खतौनी में दर्ज हो अथवा जो खेतिहर मजदूर के रूप में कृषि कार्य से जुड़े हों। दुर्घटना में मृत्यु या पूर्ण स्थायी दिव्यांगता पर 5 लाख रुपये तक की सहायता दी जाती है, जबकि आंशिक दिव्यांगता पर निर्धारित अनुपात में धनराशि प्रदान की जाती है। आवेदन तहसील स्तर पर निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार किया जाता है।

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