यह पाँचवा अष्टविनायक मन्दिर पुणे जिले का पवित्र स्थान जो कि तीन नदियों के संगम भीम मुला और मुथा पर स्थित है । अगर आप खुशिओं की तलाश में हैं और आपका मन विचलित रहता हो और चिंताएँ आपको घेरे रहती हों तो आप थेयूर आएँ और श्री चिंतामणि गणपति की पूजा करें सभी चिंताओं से मुक्ति मिल जाएगी ।

 

भगवान ब्रह्मा ने अपने विचलित मन को वश में करने के लिए यहाँ पर तपस्या की थी। यह मन्दिर मुलमुथा नदी के किनारे स्थित है और भगवान गणेश की इस स्वयंभू (स्वयं प्रकट) मूर्ति में बाईं ओर मुड़ी हुई सूंड है और यह कदम्ब वृक्ष से जुड़ी है जहाँ भगवान ब्रह्मा ने ऋषि कपिल के लिए चिंतामणी रत्न प्राप्त करने के बाद ध्यान किया था।

 

मन्दिर का प्रवेश द्वार उत्तर दिशा की ओर है और मुख्य प्रतिमा पूर्व दिशा की ओर मुख किए हुए है। मन्दिर का सभा मंडप लकड़ी का बना हुआ है। मन्दिर परिसर में पेशवा वाडा नामक एक इमारत है। पेशवा माधवराव इसी इमारत में रहते थे।

इस मन्दिर की एक सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस मन्दिर में ध्यान लगाने के लिए एक एकांत कक्ष ( ध्यान कक्ष ) भी अलग से बना हुआ है जहाँ भक्त ध्यान लगा सकते हैं।

चिंतामणि गणपति को जागृत देवस्थान माना जाता है यहाँ विराजमान गणपतिजी एक शक्तिशाली देवता हैं जो अपने भक्तों को आशीर्वाद देते हैं और उनकी मनोकामनाएँ पूरी करते हैं। भगवान गणेश की मूर्ति की आंखों में बहुमूल्य रत्न जड़ें हुए हैं ।

 

एक कथा के अनुसार , राजा अभिजीत और रानी गुनावती ने पुत्र प्राप्ति के लिए ऋषि वैशम्पायन की सलाह पर कई वर्षो तक तप किया उन्हें एक बेटा हुआ , जिसका नाम गणराजा रखा गया जो बहुत बहादुर था , पर गुस्सेवाला था।एक शिकार अभियान में उसे ऋषि कपिला के आश्रम में रूकना पड़ा । बाबा कपिला ने गणराजा का स्वागत किया साथ ही पूरी सेना को दोपहर के भोजन के लिए आमंत्रित किया । भगवान इंद्र ने ऋषि कपिला को चिंतामणि दी थी जिससे जो मांगों वह बात पूरी होती थी । चिंतामणि की शक्ति को देख लालची गणराजा ने ऋषि कपिला से उसे देने को कहा पर उन्होंने मना कर दिया , तब गणराजा ने बलपूर्वक उनसे चिंतामणि छीन ली । बाबा कपिला निराश होकर देवी दुर्गा की सलाह से भगवान गणेश की पूजा करने लगे , तब गणेशजी ने प्रसन्न होकर गणराजा से युद्ध कर चिंतामणि वापस ले ली और राजा अभिजीत को दी ,राजा अभिजीत ने जब चिंतामणि बाबा कपिला को लौटाना चाही तो उन्होंने उसे लेने से इंकार कर दिया । भगवान गणेश और गणराजा के बीच युद्ध एक कदम्ब के पेड़ के पास हुआ था तभी से इस गाँव का नाम ” कदंब तीर्थ ” पड़ गया मन्दिर का मुख्य द्वार उत्तर दिशा की ओर है । मन्दिर का हाॅल लकड़ी से बना है और हाॅल में काले पत्थर से बना एक छोटा सा फव्वारा है । मन्दिर की एक बड़ी घंटी मुख्य मन्दिर के बाहर से देखी जा सकती है । श्री मयूरेश्वर अष्टविनायक मोरगाॅंव से श्री सिद्धिविनायक थेयूर की दूरी करीब 60 कि.मी. और पूना से मात्र 22 कि.मी.ही है आप जब भी दक्षिण भारत की यात्रा करते हुए कर्नाटक और महाराष्ट्र की तरफ से मध्य प्रदेश में आ रहे हो या पुणे के आसपास के देवस्थान के दर्शन कर रहे हो तो आप इस जागृत देवस्थान के दर्शन अवश्य करें।

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