23 जनवरी दिन शुक्रवार को बसंत पंचमी महोत्सव

 

माँ सरस्वती के प्राकट्य की पौराणिक कथा ​पौराणिक शास्त्रों के अनुसार, जब सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा ने ब्रह्मांड की रचना की, तो उन्होंने पेड़-पौधे, जीव-जंतु और मनुष्यों का निर्माण तो कर दिया, लेकिन वे अपनी इस रचना से पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे। ब्रह्मा जी ने देखा कि उनकी बनाई हुई दुनिया बिल्कुल मौन और शांत है। चारों तरफ एक अजीब सी खामोशी छाई हुई थी। न तो हवाओं में सरसराहट थी, न पक्षियों की चहचहाहट और न ही मनुष्यों के पास वाणी थी। बिना स्वर और शब्द के पूरी सृष्टि नीरस और चेतनाहीन लग रही थी।

 

​अपनी रचना में इस कमी को दूर करने के लिए ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु का ध्यान किया और अपने कमंडल से पवित्र जल निकालकर उसे हवा में छिड़का। जैसे ही जल की बूंदें धरती पर गिरीं, वहाँ से एक अलौकिक ज्योति पुंज प्रकट हुआ, जो एक अत्यंत दिव्य और सुंदर देवी के रूप में बदल गया। उन देवी के मुख मंडल पर चंद्रमा के समान चमक थी, उन्होंने श्वेत (सफेद) वस्त्र धारण किए हुए थे और उनके चार हाथ थे। उनके हाथों में वीणा, शास्त्र (पुस्तक) और माला सुशोभित थी।

​ब्रह्मा जी ने उन देवी से निवेदन किया कि वे अपनी वीणा की तान से इस जगत की जड़ता और मौन को समाप्त करें। जैसे ही देवी ने अपनी वीणा के तारों को छुआ, संपूर्ण ब्रह्मांड में ‘ॐ’ की ध्वनि गूँज उठी।

 

हवाओं को गति मिली, नदियों के बहने में कल-कल का स्वर आया और समस्त प्राणियों को वाणी (स्वर) प्राप्त हुई। चूंकि उन्होंने अज्ञानता के अंधेरे को मिटाकर ज्ञान और कला का प्रकाश फैलाया, इसलिए उनका नाम ‘सरस्वती’ पड़ा।

​माँ सरस्वती के प्रकट होने का दिन माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी थी, जिसे आज हम बसंत पंचमी के रूप में मनाते हैं। वे ज्ञान, संगीत, कला और बुद्धि की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं। उनका वाहन हंस हमें विवेक सिखाता है और उनका श्वेत वर्ण पवित्रता का प्रतीक है।

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