उत्तर प्रदेश में व्यापारियों व उद्यमियों की स्टेट जीएसटी से संबंधित समस्याएँ एवं उनके निराकरण से संबंधित सुझाव और जीएसटी ट्रिब्यूनल (अधिकरण) में अपील दायर करने पर निर्धारित कोर्ट फीस, प्रार्थना पत्र प्रस्तुत करने पर प्रत्येक बार शुल्क एवं अन्य शुल्कों को समाप्त/यथोचित रूप से कम किए जाने के के संबंध में राज्यकर विभाग उत्तर प्रदेश शासन के संयुक्त सचिव ब्रजेश मिश्र को दो अलग अलग ज्ञापन सौंपे

संयुक्त सचिव राज्य कर बृजेश मिश्र ने सभी समस्याओं व सुझावो को शासन तक पहुंचाने का आश्वासन दिया

 

आज लखनऊ में भारतीय उद्योग व्यापार प्रतिनिधिमंडल के प्रदेश अध्यक्ष ज्ञानेश मिश्र के नेतृत्व में पदाधिकारियों ने उत्तर प्रदेश में व्यापारियों व उद्यमियों की स्टेट जीएसटी से संबंधित समस्याएँ एवं उनके निराकरण से संबंधित सुझाव और जीएसटी ट्रिब्यूनल (अधिकरण) में अपील दायर करने पर निर्धारित कोर्ट फीस, प्रार्थना पत्र प्रस्तुत करने पर प्रत्येक बार शुल्क एवं अन्य शुल्कों को समाप्त/यथोचित रूप से कम किए जाने के के संबंध में *राज्यकर विभाग उत्तर प्रदेश शासन के संयुक्त सचिव ब्रजेश मिश्र को* उनके राज्यकर विभाग के लखनऊ जोन के कार्यालय में दो अलग अलग ज्ञापन सौंपे |

 

संयुक्त सचिव से वार्ता में भारतीय उद्योग व्यापार प्रतिनिधिमंडल के प्रदेश अध्यक्ष ज्ञानेश मिश्र ने कहा कि कई व्यापारी व उद्यमी ई-मेल नोटिस न देख पाने या तकनीकी कारणों से नोटिस न मिल पाने के कारण निर्धारित तिथि पर उपस्थित नहीं हो सके और उनके विरुद्ध एक्स पार्टी आदेश पारित हो गए ,ऐसे सभी मामलों में व्यापारियों को नए सिरे से सुनवाई का अवसर प्रदान किया जाए ताकि वास्तविक पक्ष सुना जा सके और न्यायिक पारदर्शिता बनी रहे।

कहा कि वर्तमान में स्टेट जीएसटी के अंतर्गत उन व्यापारियों के लिए कोई विशेष एमनेस्टी योजना उपलब्ध नहीं है जिनकी अपीलें तकनीकी कारणों से स्वीकार नहीं हुईं या जिनके आदेश समय पर सूचित नहीं किए गए। सुझाव है कि ऐसे मामलों हेतु दि 31 मार्च 2026 तक एक विशेष एमनेस्टी स्कीम लागू की जाए जिससे व्यापारियों को अपील का वास्तविक अवसर मिले और लंबित विवादों का त्वरित निस्तारण हो सके।

 

यह भी कहा कि अनेकों मामलों में बकाया राशि अभिलेखीय त्रुटियों, तकनीकी गलतियों या असंगतियों के कारण प्रदर्शित हो जाती है। ऐसे में बिना पूर्व सूचना के बैंक खाते,परिसंपत्तियाँ या स्टॉक सीज़ करना व्यापारिक गतिविधियों को बाधित करता है। विभाग द्वारा कम से कम 15 दिन की नोटिस अवधि देते हुए व्यापारी को स्पष्टीकरण एवं समाधान का अवसर दिया जाए ताकि वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके।

कहा कि सर्वे या जाँच के दौरान स्टॉक सीज़ करना विधिक प्रावधानों के अनुरूप नहीं है और इससे अनावश्यक दहशत का वातावरण बनता है। उचित होगा कि स्टॉक सीज़ न करके व्यापारी को नोटिस जारी कर उत्तर देने का अवसर प्रदान किया जाए। इससे विभागीय कार्रवाई भी पारदर्शी रहेगी और व्यापारिक सम्मान भी।

 

आगे कहा कि जहाँ व्यापारी उचित आधार, साक्ष्य और दस्तावेज प्रस्तुत करते हैं वहाँ अपीलीय अधिकारियों द्वारा न्यायोचित निर्णय दिए जाएँ जिससे व्यापारियों का विश्वास बढ़े और विभागीय प्रक्रिया पारदर्शी बने।

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