जामिया अशरफुल मदारिस और जामिया अशरफुल बनात (निसवां) गद्दीयाना में ख़त्मे बुख़ारी शरीफ़ का आयोजन
कानपुर, 28 जनवरी — जामिया इस्लामिया अशरफुल मदारिस गद्दीयाना में ख़त्मे बुख़ारी शरीफ़ का बड़े पैमाने पर आयोजन किया गया इस मौके पर छात्रों और छात्राओं को बुख़ारी शरीफ़ की आख़िरी हदीस का सबक़ हज़रत अल्लामा मौलाना मुफ़्ती मोहम्मद इलियास नूरी, मुफ़्ती-ए-आज़म कानपुर ने पढ़ाया।उन्होंने आख़िरी हदीस का आसान तर्जुमा समझाते हुए कहा कि दो कलिमे ऐसे हैं जो ज़ुबान पर हल्के, मगर अमल के तराज़ू में बहुत भारी हैं और अल्लाह को बहुत प्यारे हैं“सुब्हानल्लाहि व बिहम्दिही, सुब्हानल्लाहिल अज़ीम।”
मुफ़्ती साहब ने इमाम बुख़ारी की ख़िदमात पर रोशनी डालते हुए बताया कि उन्होंने हदीस के इल्म में कई अहम किताबें लिखीं और उन्हें लगभग छह लाख हदीसें ज़ुबानी याद थीं। उन्होंने छात्रों को इमाम बुख़ारी की ज़िंदगी को अपने लिए मिसाल बनाने की नसीहत की।इस मौके पर जामिया के सरबराह आला मौलाना मोहम्मद हाशिम अशरफी ने छात्रों को समझाते हुए कहा कि हदीस का यह कीमती ख़ज़ाना हम तक यूँ ही नहीं पहुँचा। बड़े-बड़े मुहद्दिसीन ने इसे जमा करने में बहुत मुश्किलें और तकलीफ़ें उठाईं। फ़ारिग़ होने वाले छात्रों और छात्राओं को नसीहत करते हुए कहा कि पहले तुम आम लोग थे, अब आलिम बनकर समाज के सामने जा रहे हो। लोग तुम्हारे उठने-बैठने को भी दीन समझेंगे इसलिए ऐसा कोई काम न करो जो दीन के ख़िलाफ़ हो कहा जाता है कि आलिम की एक ग़लती भी बहुत बड़ी मानी जाती है इसलिए हर क़दम सोच-समझकर रखो और पूरी ज़िंदगी शरीअत और सुन्नत के मुताबिक़ गुज़ारो
इससे पहले महफ़िल की शुरुआत क़ारी मोहम्मद अहमद अशरफी की तिलावत-ए-क़ुरआन से हुई छात्रों ने नात पेश की हज़रत मौलाना हस्सान साहब ने निज़ामत की अंत में सलातो-सलाम पढ़ा गया और देश की तरक़्क़ी, अमन और दुनिया की भलाई के लिए दुआ की गई महफ़िल के ख़त्म होने पर छात्रों को दुआओं से नवाज़ा गया
इस कार्यक्रम में सैकड़ों लोग मौजूद रहे, जिनमें हाफ़िज़ हशमतुल्लाह, जमाल अहमद, अकील हसन, हाजी हैदर अली, सबा अली अशरफी, शमशाद ग़ाज़ी, मोहम्मद हनीफ़, शहज़ाद अली, मौलाना फ़तह मोहम्मद क़ादरी, मौलाना महमूद हस्सान अख़्तर अलीमी, मौलाना गुल मोहम्मद जामेई, मौलाना सुफ़ियान अहमद मिस्बाही, मौलाना मोहम्मद कलीम क़ादरी, क़ारी सैयद क़ासिम बरकाती, क़ारी मोहम्मद आज़ाद अशरफी, हाफ़िज़ मसऊद अशरफी, हाफ़िज़ मोहम्मद मुश्ताक अशरफी, मौलाना मसऊद मिस्बाही आदि शामिल थे।
