केसीएएस सीपीई स्टडी सर्कल का सेमिनार, आयकर अधिनियम के प्रावधानों पर हुई चर्चा
कानपुर। केसीएएस सीपीई स्टडी सर्कल, कानपुर द्वारा शुक्रवार को शहर के कैप्सूल रेस्तरां में एक महत्वपूर्ण सेमिनार का आयोजन किया गया। सेमिनार का विषय “आयकर अधिनियम 2025 के तहत व्यवसाय एवं पेशे से होने वाले लाभ-हानि में हुए बदलाव तथा असेसमेंट प्रोसीडिंग्स से जुड़े प्रमुख मुद्दे” रहा, जिसमें शहर के चार्टर्ड अकाउंटेंट्स और कर पेशेवरों ने सहभागिता की।
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में सीए गोविंद माहेश्वरी ने आयकर अधिनियम 2025 के अंतर्गत व्यवसाय एवं पेशे से आय से संबंधित प्रावधानों में किए गए परिवर्तनों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि नए इनकम टैक्स एक्ट 2025 में मूल प्रावधानों को बदला नहीं गया है, बल्कि उन्हें अधिक सुव्यवस्थित और सरल स्वरूप में प्रस्तुत किया गया है। पूर्व में आयकर अधिनियम 1961 के तहत व्यवसाय एवं पेशे से आय से जुड़े नियम विभिन्न धाराओं—28 से 44DB—में बिखरे हुए थे, जबकि नए कानून में इन्हें 26 से 66 तक क्रमबद्ध रूप में रखा गया है, जिससे अध्ययन और अनुपालन अधिक सहज हो गया है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि “डीम्ड प्रॉफिट” से संबंधित प्रावधान, जैसे रेमिशन, राइट-ऑफ, रिकवरी तथा विक्रय मूल्य और राइट डाउन वैल्यू के अंतर को अब एक संगठित ढांचे में समाहित किया गया है, जिससे करदाताओं के बीच उत्पन्न होने वाला भ्रम काफी हद तक समाप्त होगा। अनुमानित लाभाधान अर्थात प्रिजम्पटिव टैक्सेशन से जुड़े प्रावधान, जो पहले विभिन्न धाराओं में अलग-अलग थे, अब एक समूह में रखे गए हैं, जिससे छोटे व्यापारियों, पेशेवरों एवं परिवहन व्यवसाय से जुड़े करदाताओं को सुविधा मिलेगी।
दूसरे सत्र में सीए विवेक खन्ना ने असेसमेंट प्रोसीडिंग्स से जुड़े प्रमुख मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि री-असेसमेंट की प्रक्रिया आयकर विभाग द्वारा तब अपनाई जाती है जब यह आशंका हो कि कर योग्य आय का कोई हिस्सा छूट गया है। यह कार्यवाही धारा 147 से 151 के अंतर्गत की जाती है और हाल के संशोधनों के बाद इसे अधिक पारदर्शी बनाया गया है। नई व्यवस्था के अनुसार विभाग सीधे नोटिस जारी नहीं कर सकता, बल्कि पहले करदाता को पूरी सूचना उपलब्ध करानी होती है और उसका पक्ष सुनना अनिवार्य है। करदाता के उत्तर पर विचार करने के बाद ही कारणयुक्त आदेश पारित किया जाता है। यदि निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया जाता, तो ऐसी कार्यवाही न्यायालय में निरस्त भी की जा सकती है।
उन्होंने समयसीमा के प्रावधानों पर भी प्रकाश डालते हुए बताया कि सामान्य मामलों में तीन वर्ष के भीतर और विशेष परिस्थितियों में पाँच वर्ष तक पुराने मामलों को खोला जा सकता है, बशर्ते कि मामला संपत्ति, निवेश या विशिष्ट वित्तीय लेनदेन से जुड़ा हो। पाँच वर्ष से अधिक पुराने मामलों को केवल अत्यंत विशेष परिस्थितियों में ही खोला जा सकता है।
कार्यक्रम का संचालन कन्वीनर सीए प्रशांत रस्तोगी ने किया। डिप्टी कन्वीनर सीए नितिन सिंह ने सभी अतिथियों का स्वागत किया। सत्र की अध्यक्षता करते हुए सीए गोविंद कृष्णा ने कहा कि इनकम टैक्स एक्ट 2025 का सबसे बड़ा उद्देश्य व्यवसाय, पेशे और आकलन प्रक्रिया में स्पष्टता एवं सरलता लाना है, जिससे करदाताओं और पेशेवरों दोनों को लाभ मिलेगा।
सेमिनार में प्रमुख रूप से सीए राजीव गुप्ता, सीए अरविंद नाथ सिंह, सीए आयुष गुप्ता, सीए अंकित अग्रवाल, सीए शाश्वत गुप्ता, एन. डी. मनियार, विष्णु माहेश्वरी, विवेक अवस्थी, प्रमोद सक्सेना और नितिन द्विवेदी सहित शहर के अनेक प्रतिष्ठित चार्टर्ड अकाउंटेंट्स उपस्थित रहे।
