बेतरतीब ठेलों और अवैध कब्जे ने छीना पैदल चलने का हक, पैदल चलना हुआ दुभर

 

​वसूली के फेर में फंसा शहर का दिल

 

शहर का दिल कहे जाने वाले घंटाघर चौराहा क्षेत्र में इन दिनों प्रशासन और नगर निगम के दावों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। एक तरफ जहां नगर आयुक्त और महापौर शहर को अतिक्रमण मुक्त बनाने के लिए सघन अभियान चला रहे हैं, वहीं दूसरी ओर एक सक्रिय ‘अवैध वसूली सिंडिकेट’ सारी कोशिशों पर पानी फेर रहा है।

​​हैरानी की बात यह है कि अभी कुछ ही दिन पूर्व नगर निगम और जिला प्रशासन ने इस पूरे क्षेत्र में भारी ‘अतिक्रमण हटाओ अभियान’ चलाया था। उस वक्त लगा था कि जनता को भीषण जाम से स्थाई मुक्ति मिल जाएगी। लेकिन जमीनी हकीकत इसके उल्टी है। चंद दिनों के भीतर ही घंटाघर चौराहे पर फिर से अवैध ठेलों और पटरी दुकानदारों का कब्जा हो गया है।जिससे सरकारी दावों की पोल खुल रही है।जानकारी के अनुसार घंटाघर क्षेत्र में अवैध वसूली का एक संगठित ढांचा खड़ा कर दिया गया है। यहाँ पटरी दुकानदारों और ठेला संचालकों से अवैध रूप से ‘डेली ड्यूटी’ (रोजाना का पैसा) और ‘मंथली’ (मासिक बंधी रकम) वसूली जा रही है। सूत्रों का दावा है कि इस पूरे खेल के पीछे एक रसूखदार सिंडिकेट का हाथ है, जिसकी शह पर समूचे क्षेत्र में अतिक्रमण का जाल बिछा हुआ है।​सिंडिकेट की दबंगई का आलम यह है कि जो गरीब दुकानदार इस अवैध उगाही का विरोध करते हैं। उन्हें अवैध अतिक्रमण के नाम पर वहां से हटवाने या पुलिसिया कार्रवाई की धमकी दी जाती है। सिंडिकेट के गुर्गे डरा-धमकाकर रोजाना हजारों रुपये की अवैध कमाई कर रहे हैं, जिसके कारण गरीब दुकानदार आवाज उठाने से कतरा रहे हैं।इस सिंडिकेट के संरक्षण में बेतरतीब तरीके से लगाए जा रहे ठेलों के कारण घंटाघर चौराहे पर दिन भर भीषण जाम की स्थिति बनी रहती है। सड़क के दोनों ओर हुए इस अवैध कब्जे के चलते राहगीरों का पैदल चलना भी दूभर हो गया है। सूत्र अनुसार स्थानीय लोगों का आरोप है कि पुलिस और नगर निगम की आंखों के सामने यह खेल फल-फूल रहा है।​अब देखना यह है कि क्या कानपुर पुलिस और नगर निगम का प्रवर्तन दस्ता इस संगठित सिंडिकेट पर नकेल कसेगा या फिर महापौर और नगर आयुक्त के अभियान महज ‘कागजी खानापूर्ति’ बनकर रह जाएंगे। घंटाघर की जनता को कभी ‘जाम के जंजाल’ से स्थाई मुक्ति मिलेगी।

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