सासद सत्यदेव पचौरी ने सदन के माध्यम से माननीय गृहमंत्री जी का ध्यान देश की सर्वाेच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों में भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रयोग की ओर आकर्षित किया

कानपुर:- संसद के शीकालीन सत्र में शून्यकाल के अन्तर्गत कानपुर नगर सासद सत्यदेव पचौरी ने सदन के माध्यम से माननीय गृहमंत्री जी का ध्यान देश की सर्वाेच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों में भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रयोग की ओर आकर्षित किया।
सासंद पचौरी जी ने सदन में कहा कि भारत की स्वतंत्रता के पश्चात भारत की व्यवस्थाआंे के सुचारु संचालन हेतु संविधान को भारत के लोगों के द्वारा अंगीभूत किया गया था। न्याय व्यवस्था की भाषा को लेकर भी संविधान सभा में बहस हुई थी, तात्कालिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए देश के उच्चतम न्यायलय एवं उच्च न्यायालयों में अंग्रेजी भाषा में ही कार्य करने की अस्थाई व्यवस्था की गई थी एवं संविधान सभा ने यह भी प्रावधान किया था कि देश की संसद जब चाहे इस व्यवस्था को बदल सकती है ।
सासंद पचौरी जी ने अपने वक्तव्य में कहा कि देश की सभी निचली अदालतों में संपूर्ण कामकाज हिंदी व अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में होता है, जबकि उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय में काम सिर्फ अंग्रेजी भाषा में होता है। हिंदी व अन्य भारतीय भाषा जानने वाले न्यायाधीश भी अपीलीय मामलों की सुनवाई में दस्तावेजों का अंग्रेजी अनुवाद कराते हैं, संविधान के अनुच्छेद 19 में भारत के सभी नागरिकों को ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ अपनी भाषा में व्यक्त करने का मूल अधिकार दिया गया है। यह अभिव्यक्ति संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किसी भी भारतीय भाषा में हो सकती है।
सासंद पचौरी जी ने सदन को बताया कि हाल ही में महामहिम राष्ट्रपति जी ने भी कहा कि ‘भाषाई सीमाओं के कारण कोर्ट में वादी को अपने ही मामलों में लिए गए फैसलों को समझने के लिए संघर्ष करना पड़ता है.’ उन्होंने सुझाव दिया कि ‘सभी उच्च न्यायालय अपने-अपने प्रदेश की लोकल भाषा में जनहित के फैसलों का प्रामाणिक अनुवाद प्रकाशित और उपलब्ध कराएं। आज देश स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है और वाराणसी में आयोजित प्रथम अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन में देश के माननीय गृह मंत्री श्री अमित शाह जी ने भी सरकार के 6 संकल्प बताये थे, उनमे एक संकल्प यह था कि देश के न्याय व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है और न्यायलय में भारतीय भाषाओ में भी कार्य होना चाहिये।
सासंद पचौरी जी ने कहा कि भारत की भाषाओं में वे सभी क्षमतायें हैं जो न्यायायिक क्षेत्र की किसी भी भाषा में होनी चाहिये। देश की बहुसख्ंय आबादी अपनी भाषा में संवाद करती है। इसके बावजूद भी न्यायालयों की भाषा आज भी अग्रेंजी बनी हुयी है। न्याय व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के लिए जरुरी है कि जनता को उनकी भाषा में न्याय मिलें। सांसद पचौरी जी ने सदन के माध्यम से सरकार से अनुरोध किया कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की कार्यवाही केवल हिन्दी में हो इसमें संशोधन कर आमजन की भावनाओं का सम्मान करते हुये, इसको अविलम्ब लागू करने हेतु संविधान में संशोधन करने हेतु कदम उठायें जाएं।

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