कानपुर का ऐतहासिक मंदिर परमट का इतिहास

कानपुर का ऐतहासिक मंदिर परमट का इतिहास सैकड़ों साल पुराना है गंगा किनारे करीब 3 एकड़ में बना यह मंदिर बहुत ही प्राचीन है I परमट मंदिर के महंत श्याम गिरी महाराज ने बताया कि उस समय में यहाँ पर एक विशाल टीला हुआ करता था जिसके पास कई गाय चरने आती थी तभी कानपुर के पुराना सीसामऊ निवासी जमींदार गोकुल प्रसाद मिश्रा की गायें भी यहाँ चरने आया करती थी उन गायों में से एक आनंदी गाय दोपहर में चर कर आने के बाद दूध नहीं देती थी जिस पर जमींदार गोकुल प्रसाद ने चरवाहे से उस गाय पर निगाह रखने के लिए कहा I शाम को चरवाहे ने गोकुल प्रसाद मिश्रा जी को बताया कि आनंदी गाय उस टीले पर जा कर बैठती है और जब शाम को चलने के समय अपना सारा दूध उस टीले पर गिरा देती है I जमींदार को बड़ा आश्चर्य हुआ तो जमींदार स्वयं उस टीले को देखने गए और जब जमींदार ने अपनी आँखों से गाय को दूध गिराते देखा तो वहां पीपल के पेड़ के नीचे विराजमान महात्मा आनंद गिरी महाराज से जमींदार ने पूरा प्रकरण बताया तो उन्होंने कहा कि वहां पर कोई देव विराजमान है फिर जमींदार ने रहस्य को जानने के लिए उस टीले पर खुदाई कराई I 2 दिन की खुदाई के बाद उस टीले से 2 शिवलिंग निकले जिसमें से 1 शिवलिंग को जमींदार ने सीसामऊ में वन में स्थापित किया जिसका नाम वनखंडेश्वर पडा दूसरा स्वयंभू शिवलिंग मिला जिसको यहीं पर स्थापित कर दिया गया जमींदार गोकुल प्रसाद मिश्रा ने रुद्राभिषेक कराने के बाद मंदिर का निर्माण कराया और महात्मा आनंद गिरी महाराज के नाम पर उक्त मंदिर का नाम आनन्देश्वर पड़ा I करीब 250 वर्ष पहले जमींदार गोकुल प्रसाद मिश्रा ने मंदिर का संचालन गुरु और शिष्य की परम्परा के अनुसार संचालन का निर्णय लिया I जिसके बाद गुरु और शिष्य की परम्परा के अनुसार मंदिर का संचालन सैकड़ों वर्षों से चला आ रहा है जिसमें गुरु अपने जिस शिष्य का पट्टा अभिषेक करके वसीयत करता था वही शिष्य गुरु के शरीर छोड़ने के बाद मंदिर का संचालक होता है जो कि आजीवन होता है इसी तरह 1945 में महेश गिरी महाराज आनन्देश्वर मंदिर के महंत थे तभी कुछ क्षेत्रीय लोगों ने आनन्देश्वर ट्रस्ट कमिटी बना कर कब्जा करने का प्रयास किया जिसकी लड़ाई महंत महेश गिरी महराज ने हाई कोर्ट इलाहाबाद तक लड़ी जिसमें 1969 में मा. हाई कोर्ट द्वारा महंत महेश गिरी महराज के पक्ष में फैसला हुआ और ट्रस्ट को खारिज करके मंदिर के संचालन की व्यवस्था दी गयी कि गुरु दर शिष्य की परम्परा के अनुसार मंदिर का संचालन होगा I जिसके बाद दशरथ गिरी महाराज मंदिर के महंत हुए जो 1974 तक महंत रहे वो महेश गिरी महाराज के शिष्य थे I इसके बाद दशरथ गिरी महाराजके शिष्य लहर गिरी महाराज 1984 तक महंत रहे इसके बाद इनके शिष्य चतुर गिरी महाराज 1994 तक मंदिर के महंत रहे I इसके बाद उन्होंने अपने सबसे प्रिय शिष्य श्याम गिरी महाराज को वसीयत कर पट्टाभिषेक करके महंत घोषित किया जिसके बाद श्याम गिरी महाराज मंदिर का स्वतंत्र रूप से संचालन करते रहे जिसमें किसी का भी कोई हस्तक्षेप नहीं था I इसके बाद सन 2011 में महंत श्यामगिरी और उनके शिष्य अमर कंटक गिरी उर्फ़ रामदास में विवाद हो गया जिस पर श्याम गिरी महाराज ने संतों की संस्था श्री पंचदसनाम जूना अखाड़ा से व्यक्तिगत मदद मांगी और आग्रह किया कि उनका स्वास्थ्य खराब है और शिष्य से विवाद चल रहा है इस लिए दो साधुओं को मदद के लिए भेज दें जो मंदिर की देखरेख कर सके जिसकी लिखापढ़ी भी हुई कि गुरु शिष्य का विवाद निस्तारित होने तक जूना अखाड़ा के दो साधू रमेश पुरी और रामानंद गिरी मंदिर की देखभाल करेंगे I इसी बीच सन 2019 में रामानद गिरी जी और 2020 में रमेश पुरी जी ने अपना शरीर त्याग दिया I इसके बाद जूना अखाड़ा द्वारा जबरन 4 साधू मंदिर के लिए देखरेख के लिए भेज दिए गए I जिस पर श्यामगिरी महाराज द्वारा कड़ा विरोध जताया गया लेकिन जूना अखाड़ा ने महंत जी की एक नहीं सुनी जिसके बाद श्यामगिरी महाराज और उनके शिष्य अमर कंटक गिरी के बीच आपसी समझौता हो गया I जिस पर पूर्व में तय अनुसार श्यामगिरी महाराज द्वारा जूना अखाड़े को पत्र लिखकर मंदिर में जबरन रह रहे जूना अखाड़े के साधुओं को वापस बुलाने का आग्रह किया गया I लेकिन जूना अखाड़ा द्वारा दबंगई से मंदिर में कब्जा करने की नियत से हरिगिरी महाराज, प्रेमगिरी महाराज व इच्छागिरी महाराज के नेतृत्व में जूना अखाड़े के 2 दर्जन साधुओं ने मंदिर में धावा बोल दिया जिसमें परमट मंदिर के कर्मचारियों भक्तों और क्षेत्रीय लोगों ने पुरजोर विरोध किया और पुलिस कमिश्नर से लेकर मुख्यमंत्री तक मामले की शिकायत करते की है।

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