धार्मिक मान्यता है कि शनि देव के दर्शन सामने से नहीं करने चाहिए। अतः यहां भी दर्शनों के लिए दर्शनार्थी दक्षिण दिशा से क्लाक वाईज चलते हुए पश्चिम दिशा में आकर शनि देव के दर्शन करके पुनः बाहर पश्चिम दिशा में आते हैं और फिर उत्तर तथा पूर्व दिशा से होते हुए पुनः दक्षिण दिशा में ही आकर बाहर निकल जाते हैं। शनि देव के दर्शन की इस प्रक्रिया को कुछ लोग अंधविश्वास कह सकते है किंतु शनि देव के दर्शन के लिए सदियों से अपनाई जा रही यह प्रक्रिया वास्तु के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत का पालन करने के लिए है।
चीनी वास्तु शास्त्र फेंगशुई का एक सिद्धांत है कि मुख्यद्वार के सामने मध्य का भाग प्रसिद्धि का होता है। अतः यहां लाल रंग होने से प्रसिद्धि बढ़ती है और काला रंग होने से प्रसिद्धि धूमिल होती है। भारत में भी मुख्यद्वार पर बनाए जाने वाले मांगलिक चिन्ह लाल रंग से बनाए जाते हैं जैसे ओम्, एकओमकार, स्वातिक, शुभ-लाभ इत्यादि।
मंदिरों में भी मुख्यद्वार के सामने स्थित मूर्ति को लाल रंग के वस्त्र पहनाना शुभ माना जाता है। शनि देव को काले रंग के वस्त्र पहनाए जाते हैं उनकी मूर्ति पर काला रंग किया जाता है। ऐसी स्थिति में यदि मुख्यद्वार के सामने मूर्ति स्थापित की जाए तो वास्तु एवं फेंगशुई के उपरोक्त सिद्धांतों की अवहेलना होने से मंदिर की प्रसिद्धि को हानि पहुंचती है।
निश्चित ही इसलिए सदियों पूर्व विद्वान ऋषियों-मुनियों द्वारा शनि देव की मूर्ति को मंदिर के मुख्यद्वार के ठीक सामने स्थापित न करवाते हुए दाएं ओर स्थापित करवाने की पंरपरा डलवाई होगी। श्री शनिधाम में भी इसी वास्तुनुकुल परंपरा का पालन किया

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