श्रीवैकुण्ठ चतुर्दशी है आज

कार्तिक मास में दो चतुर्दशी हैं- कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी ‘नरक चतुर्दशी’ और शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी ‘वैकुण्ठ चतुर्दशी’। उपवास और पूजन के निमित्त वैकुंठ चतुर्दशी का व्रत शनिवार दिनांक 25 नवंबर को और केवल पूजन के निमित्त रविवार दिवसांक 26 नवंबर को वैकुंठ चतुर्दशी मनाया जाएगा।

 

वैकुंठ चतुर्दशी मनाने की प्रायः दो परंपरा है-कुछ श्रद्धालु दिन भर उपवास रहकर रात में रात्रि-जागरण करके विष्णु भगवान की पूजा करते हैं। ये लोग मध्य रात्रि में चतुर्दशी जिस दिन होता है उसी दिन उपवास करते हैं और रात में पूजन करते हैं।

दूसरी परंपरा में पहले दिन उपवास करके दूसरे दिन अरुणोदय व्यापिनी चतुर्दशी में शिव -पूजन करने के बाद पारणा की जाती है। इस मत को मानने वाले जिस दिन अरुणोदय काल में चतुर्दशी होती है, उस दिन वैकुंठ चतुर्दशी मनाते हैं।

 

व्रत विधान –

वैकुंठ चतुर्दशी के दिन, दिन भर उपवास रखकर रात में भगवान विष्णु की कमल पुष्प से पूजन करना चाहिए। तदुपरान्त भगवान शिव का पूजन करना चाहिए। इस दिन शिव को तुलसी पत्र भी चढ़ाया जाता है। यह वर्ष में एक ऐसी तिथि है जिस दिन हरि और हर का एक साथ पूजन कर व्यक्ति वैकुण्ठ लोक का अधिकारी हो जाता है। बिना हरि के पूजन के हर का पूजन नहीं करना चाहिए, अन्यथा पूजा निष्फल होता है। रात व्यतीत होने पर दूसरे दिन शिव का पुन: पूजन कर ब्राह्मणों को भोजन कराकर स्वयं भोजन करना चाहिए।

 

एक बार भगवान विष्णु देवाधिदेव महादेव का पूजन करने काशी आए। मणिकर्णिका घाट पर स्नान कर १००८ कमल पुष्पों से विश्वनाथ जी के पूजन का संकल्प लिए। पूजन के मध्य महादेव ने परीक्षा लेने के लिए एक कमल का पुष्प अदृश्य कर दिए। एक पुष्प की कमी देखकर भगवान विष्णु ने अपने कमलवत नेत्र को चढ़ाने के लिए उद्यत हो गये। भगवान विष्णु की अगाध भक्ति देखकर महादेव प्रकट हो गये और वरदान दिए कि आज के दिन पहले आप का पूजन तब मेरा पूजन होगा। इस तरह जो करेगा वह वैकुंठ वासी होगा तथा यह चतुर्दशी तिथि ‘वैकुंठ चतुर्दशी ‘ के नाम से जानी जाएगी तथा आज से आपका एक नाम ‘ पुण्डरीकाक्ष ‘ भी होगा।

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