“शहर था ख्वाबों का, पोस्टरों में दफ्न हो गया — स्मार्ट सिटी नहीं, ‘होडिंगपुर’ बन गया कानपुर”
जिस शहर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्मार्ट सिटी के रूप में देखने का सपना दिखाया और जिसे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने प्रिय नगर के रूप में संवारने की बात करते हैं, उसी कानपुर की पहचान आज लोहे के फ्रेमों पर टंगी तस्वीरों और स्वागत की होड़ में गुम हो चुकी है। सड़कों पर चलते हुए अब इमारतें कम, होर्डिंग्स ज्यादा दिखती हैं। लगता है जैसे कानपुर नहीं, कोई ‘होडिंगपुर’ हो।
शहर के प्रमुख चौराहे हों या व्यस्त सड़कें, फ्लाईओवर हों या बाजार—हर जगह नेताओं के स्वागत में लगे पोस्टर और होर्डिंग्स शहर की सांसें घोंट रहे हैं। इन पर मुस्कराते चेहरे बताते हैं कि यह अव्यवस्था किसी एक का कारनामा नहीं, बल्कि छुटभैया नेताओं से लेकर विधायक और सांसद तक की साझा संस्कृति बन चुकी है।
विडंबना यह है कि जिन हाथों में शहर को दिशा देने की जिम्मेदारी है, वही हाथ शहर की सूरत बिगाड़ने में जुटे हैं। राजनीति, जो कभी सेवा और सादगी का प्रतीक मानी जाती थी, आज दिखावे और आत्मप्रचार की प्रतियोगिता में बदल चुकी है।
राजनीतिक सुचिता अब भाषणों में ज़िंदा है,मंचों पर चमकती है,जमीन पर दम तोड़ती है
व्यवहार में उसकी जगह ले चुकी है।स्वागत की होड़,नेताओं को खुश करने की संस्कृति,नियमों को नजरअंदाज कर खुद को बड़ा दिखाने की होड़
सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या नागरिक होने का कर्तव्य यही रह गया है कि सार्वजनिक संपत्ति को पोस्टर-पटाखों से ढक दिया जाए?
क्या स्मार्ट सिटी का मतलब ट्रैफिक साइन छुपाना, फुटपाथों पर कब्जा करना और शहर की सुंदरता को होर्डिंग्स के नीचे दबा देना है?
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि ये होर्डिंग्स केवल आंखों को नहीं चुभतीं, बल्कि दुर्घटनाओं का कारण भी बन रही हैं। कई जगह ट्रैफिक संकेत पूरी तरह ओझल हो चुके हैं। तेज़ हवा और बारिश में गिरती होर्डिंग्स जानमाल के लिए खतरा बन जाती हैं, लेकिन प्रशासनिक कार्रवाई या तो दिखती नहीं, या फिर चुनिंदा मामलों तक सीमित रह जाती है।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि नियम-कानून आम आदमी के लिए सख्त हैं, लेकिन राजनीतिक चेहरों के आगे बौने साबित होते हैं। यदि होर्डिंग किसी आम व्यक्ति की हो तो तत्काल कार्रवाई, और यदि नेता का हो तो फाइलें खामोश।
आज जरूरत है कि नगर निगम, जिला प्रशासन और पुलिस बिना किसी राजनीतिक भेदभाव के अवैध होर्डिंग्स पर कार्रवाई करें। नाम बड़ा हो या छोटा—नियम सबके लिए एक हों। तभी स्मार्ट सिटी की अवधारणा कागज से निकलकर जमीन पर उतरेगी।
कानपुर को होर्डिंग्स की बस्ती नहीं,अनुशासन, सौंदर्य और जिम्मेदारी का शहर बनाना होगा।
वरना आने वाली पीढ़ियां यही कहेंगी—शहर तो था अपना,
मगर तस्वीरों के नीचे दबकर रह गया।
