बसन्त पंचमी
************
ब्यार शीतल बह रही है,आज बसन्त है बहार है
धरती दुल्हन हो रही , आज प्रकृति में निखार है
रोमान्चित मन हो उठा है,भरी दिलों में उमंग है
प्रकृति ने श्रंगार किया है ,फूलों में अनेक रंग हैं
नभ नशीला हो गया,जुड़ी हुयी डोर से पतंग है
दाँव पेँच चल रहे हैं,बड़ा ही सुन्दर सा संभार है
धरती दुल्हन हो गयी ——–
सेज धरा की सज गयी,विटप अलंकृत हो गये
युवा दिलों की वीणा के,तार भी झंकृत हो गये
किस पुष्प से मधुपान करें,भँवरे भ्रमित हो गये
उर भी उष्मित हो गये,बस प्यार की दरकार है
धरती दुल्हन हो गयी——-
सरसों पीली पुष्पित हुयी,श्रंगारित श्रंगार वसन्त है
विरहणी विलक्षित हो गयी दूर गये जिनके कन्त हैं
चहुँ दिशाऐं महक रही,दृष्टि जाये आज दूर दिगंन्त है
विरहणी बसन्त से ये पूछती,कब आयेगा भरतार है
धरती दुल्हन हो गयी——-
कोयल की कुहुक से,उर में कसक सी जाग रही
धरा रुप बसन्त है ,विरत मैं ही क्यूँ निर्भाग रही
पुष्प पराग पर मधुप सब बिखेर अपना राग रही
बसन्त ये कैसा आया धरा पे,मेरा तो पतझार है
धरा दुल्हन हो गयी——-
उपवन में भँवर गुन्जार,टहनी फूलों से लद रही
कितना सुन्दर संभार है ,सुन्दरता की हो हद रही
पुष्प और भँवर मिलन से,षोड़शी हो गदगद रही
ना जिगर बच पायेगा,कजरारी अँखियाँ बनी कटार हैं
धरती दुल्हन हो गयी, आज प्रकृति में निखार है।
