इतिहास की मूक नायिका: त्याग की वो देवी, जिसे महाभारत भूल गया

 

महाभारत का ज़िक्र होते ही हमारे मन में कुंती का संघर्ष, गांधारी की पीड़ा द्रौपदी का अपमान या उत्तरा का वैधव्य सामने आता है। लेकिन क्या आपने कभी उस नारी के बारे में सोचा है जिसने इन रानियों के बराबर शायद उनसे भी अधिक कष्ट सहा पर उसके त्याग पर कभी चर्चा नहीं हुई

 

यह कहानी है पांडव कुल की पहली कुलवधू की जिसका जीवन केवल देने के लिए बना था, पाने’ के लिए नहीं।

 

कठिन प्रेम और भाई का वध

उसका जीवन एक विरोधाभास से शुरू हुआ। उसका पालन-पोषण घने जंगलों में उसके भाई ने किया। विडंबना देखिए उसने अपना दिल भी उसी पुरुष को दिया, जिसने उसके भाई (हिडिम्ब) का वध किया। अपने प्रेम के लिए अपने ही भाई की मृत्यु को स्वीकार करना एक स्त्री के हृदय पर क्या गुजरी होगी, इसकी कल्पना भी कठिन है।

 

बिना महल की रानी

वह पांडव परिवार की प्रथम बहू बनीं। तकनीकी रूप से वह महारानी थीं, लेकिन राजसी सुख का एक कण भी उनके भाग्य में नहीं था। उनका विवाह एक निष्ठुर ‘मशर्त पर हुआ जैसे ही संतान का जन्म होगा, उसका प्रिय पति उसे छोड़कर चला जाएगा।

सोचिए उस नवविवाहिता की मनोदशा, जिसे पता हो कि उसका सुहाग बस कुछ ही दिनों का मेहमान है

एकाकी जीवन और एकल परवरिश

 

संतान (घटोत्कच) के जन्म लेते ही भीम ने वचन के अनुसार उसे त्याग दिया। सास कुंती और अन्य पांडव अपनी यात्रा पर आगे बढ़ गए। किसी ने मुड़कर नहीं देखा कि जंगल में वह अकेली स्त्री और नन्हा बालक किस हाल में हैं। न राजमहल न सेवक न पति का साथ उसने अकेले ही अपने पुत्र को एक महान योद्धा बनाया।

महाभारत का निर्णायक बलिदान

 

सालों तक उपेक्षित रहने के बाद भी, जब पांडवों पर विपत्ति (महाभारत युद्ध) आई तो वह प्रतिशोध लेने नहीं, बल्कि सहायता करने आई।

 

उसने अपने जिगर के टुकड़े अपने इकलौते बेटे घटोत्कच को रणभूमि में झोंक दिया। वह जानती थी कि युद्ध का परिणाम मृत्यु हो सकता है फिर भी धर्म और पति के परिवार’ के लिए उसने अपना सर्वस्व वार दिया।

 

घटोत्कच इतना शक्तिशाली था कि यदि कर्ण के पास वह अमोघ शक्ति न होती, तो वह एक दिन में युद्ध समाप्त कर देता। हिडिम्बी का त्याग देखिए उसके बेटे की मृत्यु ने ही अर्जुन के प्राण बचाए।

 

सिर्फ बेटा ही नहीं पोते भी

बलिदान की गाथा यहीं नहीं रुकी। घटोत्कच के पुत्र (हिडिम्बी के पोते)बर्बरीक अंजनपर्वण और मेघवर्ण भी अजेय योद्धा थे। हम आज जिसे खाटू श्याम जी (बर्बरीक) के नाम से पूजते हैं, वह इसी महान दादी का पोता था, जिसने शीश का दान दे दिया।

 

एक ही युद्ध में अपना सुहाग (जो कभी साथ न रहा), अपना बेटा और अपने पोते खोने वाली वह माँ नितांत अकेली रह गई। कोई उसे सांत्वना देने वाला भी न था।

 

वह देवी थी हिडिम्बी

हाँ वह भीम की पत्नी हिडिम्बी थी।एक राक्षसी कुल की होकर भी उसने जो मानवीयता प्रेम और त्याग दिखाया, वह किसी भी देवी से कम नहीं था। उसने जीवन भर एक पत्नी और माँ के कर्तव्यों को निभाया, बदले में बिना कोई अपेक्षा किए।

 

आज भी जब महाभारत के वीरों की बात हो, तो याद रखिएगा—पांडवों की जीत की नींव में एक वनवासिनी माँ के आंसुओं की नमी भी है।

 

त्याग की प्रतिमूर्ति माता हिडिम्बी को शत-शत नमन।

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