आज शबरी जयंती

त्रेता युग की पवित्र भूमि दंडकारण्य में एक साधारण-सी प्रतीत होने वाली, पर भीतर से तप और प्रेम से भरी एक वृद्धा निवास करती थी। उसका नाम था शबरी। वह कोई राजकुमारी नहीं थी, न ही किसी कुलीन वंश से आई थी, किंतु उसका हृदय भक्तिरस से सराबोर था। युवावस्था में ही उसने संसार के बंधनों को त्याग दिया और मतंग ऋषि के आश्रम में शरण ली।

 

वहाँ उसने सेवा को ही साधना बनाया। आश्रम की प्रत्येक कुटिया, प्रत्येक पत्ता, प्रत्येक जलकुंड उसकी करुणा से चमक उठता था। ऋषि मतंग ने उसकी निष्कपट भक्ति देखकर आशीर्वाद दिया था बेटी शबरी, एक दिन स्वयं श्रीराम तुम्हारे द्वार आएँगे। उसी दिन से शबरी का जीवन प्रतीक्षा बन गया।

 

वर्ष बीतते गए, ऋषि मतंग ब्रह्मलीन हो गए, पर शबरी आश्रम छोड़कर कहीं नहीं गई। उसकी आँखों में केवल एक ही सपना था— प्रभु राम के दर्शन। वह प्रतिदिन प्रातः उठकर आश्रम को स्वच्छ करती, पुष्प चुनती, जल भरती और वन से फल लाकर रखती। प्रत्येक दिन सोचती— आज मेरे राम आएँगे। जंगल की पगडंडियों पर जब भी किसी के चरणों की आहट होती, शबरी का हृदय धड़क उठता। वृद्ध शरीर थक चुका था, पर विश्वास कभी नहीं थका। उसकी साधना न मंत्र थी, न यज्ञ— उसकी साधना थी प्रेम भरी प्रतीक्षा।

 

एक दिन वही शुभ घड़ी आई। वन पथ पर दो तेजस्वी पुरुष और उनके साथ एक वानर दिखाई दिए। वे थे श्रीराम, लक्ष्मण और हनुमान। शबरी दूर से ही पहचान गई कि आज उसकी प्रतीक्षा पूर्ण होने वाली है। वह काँपते हाथों से द्वार पर पहुँची, आँखों से अश्रुधारा बहने लगी। वर्षों की साधना उस क्षण में सिमट आई। उसने राम को प्रणाम किया और उन्हें कुटिया में ले गई। प्रेमवश उसने वन से लाए बेर प्रभु को अर्पित किए। कहीं खट्टा न हो जाए, इस डर से उसने पहले स्वयं चखकर देखा और फिर प्रभु को दिया। लक्ष्मण को यह अनुचित लगा, पर श्रीराम मुस्कराए और बोले— लक्ष्मण ये बेर प्रेम से भरे हैं इन्हें खाकर मैं तृप्त हो गया।प्रभु ने वह फल नहीं, शबरी का हृदय स्वीकार किया था।

शबरी के लिए वह क्षण जीवन की सिद्धि था। राम से बातें करते हुए उसका मन शांत हो गया। उसने सीता माता का हाल पूछा, राम के दुःख सुने और उन्हें सुग्रीव तक पहुँचने का मार्ग बताया। प्रभु राम ने भी शबरी को अपने चरणों का स्पर्श दिया और कहा शबरी, तुम्हारी भक्ति ने मुझे बाँध लिया। उसी क्षण शबरी का शरीर जैसे प्रकाश में विलीन हो गया। वह केवल एक वृद्धा नहीं रही, वह भक्ति की अमर ज्योति बन गई। जिस दंडकारण्य में वह रहती थी, वह स्थान तीर्थ बन गया।

 

शबरी जयंती केवल कथा नहीं, जीवन का संदेश है। शबरी हमें सिखाती हैं कि भक्ति जन्म, जाति, ज्ञान या वैभव से नहीं होती, भक्ति होती है निष्कपट प्रेम से। उसने कभी बड़ा यज्ञ नहीं किया, पर उसकी प्रतीक्षा ही पूजा थी। उसने कभी मंत्र नहीं पढ़े, पर उसका विश्वास ही मंत्र था। शबरी बताती हैं कि जब हृदय सच्चा हो, तो भगवान स्वयं भक्त के द्वार पर चलकर आते हैं।

 

शबरी की कथा हमें सिखाती है कि

सच्ची भक्ति में अहंकार नहीं होता।

प्रेम से किया गया छोटा कर्म भी महान बन जाता है।

प्रतीक्षा जब विश्वास से जुड़ जाए, तो वह साधना बन जाती है।

भगवान बाहरी शुद्धता नहीं, भीतर की पवित्रता देखते हैं।

शबरी जयंती हमें यह स्मरण कराती है कि यदि मन में निष्कलंक प्रेम हो, तो दंडकारण्य भी वैकुंठ बन जाता है और साधारण भक्त भी अमर हो जाता है।

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