अहिल्या जल्द-से-जल्द शाप मुक्त हो और गौतम ऋषि द्वारा बताये गये शाप के निवारण के लिये सभी देव एकजुट हो भगवान् विष्णु के पास गये और उन्हें पूरी व्यथा कह सुनाई। तथा भगवान् विष्णु से अहिल्या के उद्धार की प्रार्थना की।
त्रेता युग में भगवान् विष्णु ने मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के रूप में अवतार लिया। महर्षि विश्वामित्र ताड़का नामक राक्षसी के वध के लिए अयोध्या से श्रीराम एवं लक्ष्मण जी को साथ ले गये थे। ताड़का के वध के उपरांत जब वे यज्ञ के लिए आश्रम की ओर प्रस्थान कर रहे थे तो रास्ते में एक सुनसान पड़े आश्रम पर प्रभु श्रीराम की दृष्टि पड़ी जिसके बारे में उन्होंने महर्षि से जानना चाहा तो महर्षि ने बताया कि यह ऋषि गौतम का आश्रम है, तथा अहिल्या के साथ हुई घटना का पूरा वृतांत भी बताया।
तथा अहिल्या के उद्धार के लिये बताये गये उपाय का भी वर्णन किया कि ” गौतम ऋषि ने अहिल्या के उद्धार का उपाय यह बताया था कि जब भगवान् विष्णु स्वयं मर्यादा पुरूषोत्तम के रूप में आकर तुम्हें स्पर्श करेंगे तब तुम इस शाप से मुक्त हो कर उनके पास पुनः आ सकोगी तथा तभी हजार लिंगी इन्द्र भी हजार नेत्री हो जायेंगे।
सारा वृतांत सुनाने के उपरांत महर्षि ने प्रभु श्रीराम से निरापराध कष्ट भोग रही अहिल्या को स्पर्श कर उसका उद्धार करने को कहा। प्रभु श्रीराम के स्पर्श मात्र से ही अहिल्या पुनः स्त्री रूप में आ गयी तथा प्रभु श्रीराम को प्रणाम कर देवलोक में ऋषि गौतम के पास चली गयीं। तथा उसी समय हजार लिंगी इन्द्र भी हजार नेत्री हो गये इन्द्र को सहस्त्र नेत्री भी कहा जाता है।
यह थी एक निरापराध स्त्री अहिल्या की कथा जिसके उद्धार के लिए भगवान् श्रीहरि विष्णु को मर्यादा पुरूषोत्तम के रूप में अवतार लेना पड़ा था। भगवान् श्रीराम के अवतार के अनेक कारणों में से “अहिल्या उद्धार” भी एक प्रमुख कारण था।
अहिल्या की कथा सदा ही विवादों से ग्रसित रही है, किन्तु यहाँ इस कथा का मंतव्य किसी विवाद को बढ़ावा देने का नहीं है अपितु मंतव्य सिर्फ यह है कि अपराध चाहे इन्द्र का हो या ऋषि गौतम के क्रोध का किन्तु सजा मिली निरापराध स्त्री अहिल्या को युगों तक पाषाण बन कर रहने की। जिसका निवारण करने के लिये स्वयं भगवान् विष्णु को युगों के चक्र में परिवर्तन करके त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम अवतार लेना पड़ा।
