आयकर अधिनियम 2025 के दंड प्रावधानों पर इनकम टैक्स बार में मंथन
कानपुर। कानपुर इनकम टैक्स बार एसोसिएशन द्वारा आयकर अधिनियम 1961 तथा नव अधिनियमित आयकर अधिनियम 2025 के अंतर्गत दंड प्रावधानों पर समूह चर्चा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में वरिष्ठ चार्टर्ड अकाउंटेंट एवं संस्था के पूर्व अध्यक्ष सीए राजीव मेहरोत्रा ने मुख्य वक्ता के रूप में विषय पर विस्तृत प्रकाश डाला।
सीए राजीव मेहरोत्रा ने कहा कि हाल ही में अधिनियमित आयकर अधिनियम 2025, आगामी 1 अप्रैल 2026 से आयकर अधिनियम 1961 का स्थान लेगा। इसके साथ ही दंड संबंधी प्रावधानों में भी कई बदलाव प्रभावी होंगे। उन्होंने बताया कि अगले कम से कम छह वर्षों तक दोनों अधिनियमों और उनके दंड प्रावधानों की जानकारी करदाताओं, कर सलाहकारों और कर प्रशासन के लिए समान रूप से आवश्यक रहेगी।
उन्होंने कहा कि नए अधिनियम के मूल प्रावधानों में बहुत बड़े परिवर्तन नहीं किए गए हैं, लेकिन वित्त विधेयक 2026 में प्रस्तावित दंड प्रावधानों में कुछ महत्वपूर्ण और दूरगामी बदलाव किए गए हैं, जिनसे करदाताओं और पेशेवरों के बीच चिंता की स्थिति बनी हुई है। परंपरागत रूप से दंड केवल उन मामलों में लगाया जाता था जहां दोषपूर्ण मानसिकता या जानबूझकर की गई चूक सिद्ध होती थी। कानून में तकनीकी अथवा मामूली त्रुटियों को दंड से मुक्त रखा गया था और जहां करदाता अपने सद्भावनापूर्ण विश्वास या उचित कारण को सिद्ध कर देता था, वहां राहत प्रदान की जाती थी। साथ ही दंड आरोपित करने की प्रक्रिया को कर निर्धारण कार्यवाही से पृथक रखा गया था, जिससे आय में की गई वृद्धि स्वतः दंड का आधार नहीं बनती थी।
उन्होंने बताया कि प्रस्तावित संशोधनों के तहत इस सिद्धांत में बदलाव किया गया है। कुछ मामलों, जैसे कर लेखा परीक्षा रिपोर्ट, ट्रांसफर प्राइसिंग रिपोर्ट तथा निर्दिष्ट वित्तीय लेनदेन रिपोर्ट दाखिल करने में विलंब को अब दंड के बजाय अनिवार्य शुल्क के रूप में वसूलने का प्रावधान प्रस्तावित किया गया है। उनके अनुसार यह व्यवस्था कुछ परिस्थितियों में प्राकृतिक न्याय के विपरीत प्रतीत होती है, क्योंकि कई बार रिपोर्ट दाखिल करने में विलंब अपरिहार्य कारणों से भी हो सकता है और ऐसे में यह प्रावधान ईमानदार करदाताओं के लिए प्रतिकूल साबित हो सकता है।
समूह चर्चा की गोष्ठी के सभापति सीए गोविन्द कृष्णा ने बताया कि एक अन्य महत्वपूर्ण परिवर्तन 1 अप्रैल 2027 से प्रभावी होगा, जिसके अंतर्गत प्रत्येक निर्धारण या पुनःनिर्धारण आदेश के साथ ही दंड आदेश पारित करना अनिवार्य किया गया है। उन्होंने कहा कि पहले दंड प्रायः प्रथम अपील के बाद लगाया जाता था, जिससे उन मामलों में अनावश्यक दंड की देनदारी से राहत मिल जाती थी जहां अपील का निर्णय करदाता के पक्ष में आता था और इससे करदाताओं तथा विभाग दोनों के समय और संसाधनों की बचत होती थी।
उन्होंने कहा कि नए प्रावधानों के लागू होने से निर्धारण और दंड आदेश एक साथ पारित होने के कारण करदाताओं पर तात्कालिक रूप से अधिक मांग का दबाव बनेगा। इससे पूर्व जमा राशि की आवश्यकता बढ़ेगी, अपीलीय कार्यवाही का भार बढ़ेगा और अनुपालन लागत में भी वृद्धि होगी। साथ ही विवादों में बढ़ोतरी और लंबित कर मांगों के बढ़ने की संभावना भी बनी रहेगी, जो करदाताओं और कर प्रशासन दोनों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्था के अध्यक्ष प्रदीप कुमार द्विवेदी ने की, जबकि संचालन वित्त सचिव आशीष जौहरी ने किया। अंत में उपाध्यक्ष मनीष श्रीवास्तव ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
इस अवसर पर राजीव गुप्ता, प्रशांत रस्तोगी, दीप कुमार मिश्र, सुनील त्रिवेदी, विश्राम सिंह यादव, विजय कुमार त्रिपाठी, अमित गुप्ता, गोपाल कृष्ण गुप्ता, महेन्द्र बाजपेयी, संजय शुक्ला, शरद निगम, आनंद सिंह, रणजीत सिंह, मुकुंद गुप्ता, ओ.पी. वर्मा, मलय गुप्ता, मनीष गुप्ता सहित बड़ी संख्या में सदस्य उपस्थित रहे।
