कानपुर . अप्रैल से ही गर्मी लोगों को झुलसा रही है. देश में मानसून ने भले ही कुछ दिन पहले दस्तक दे दी हो, लेकिन कानपुर की गर्मी को देखते हुए फिलहाल यहां इसका असर नहीं दिख रहा है. ऐसे में डाक्टर सलाह दे रहे हैं कि बहुत जरुरी होने पर ही घर से बाहर निकले. कोशिश यही करें कि खुले आसमान के नीचे न ही आना पड़े. इसके बाद भी शायद महानगर के ज्वाला देवी गर्ल्स इंटर कॉलेज की शिक्षिकाओं को इन बातों से कोई अंतर नहीं पड़ता.
सोमवार की दोपहर का समय, जिन लोगों को बाहर निकलना जरुरी था, वो वाहनों से अपने गंतव्य की ओर जा रहे थे. तभी एक चौराहे पर कुछ छात्राएं स्कूल ड्रेस में गाड़ियों को रुकने के लिए हाथ देती हैं. उनमें से कुछ गाडियां रुकती हैं, तो ये छात्राएं उन्हें बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का पम्पलेट पकड़ा देती हैं. दुपहिया वाहन चालक इतनी जरा सी देर में ही पसीने से नहा जाता है. उनके मन में सिर्फ एक ही सवाल आता है. जब कुछ मिनट रुकने पर मेरा यह हाल है, तो न जाने कब से ये बेटियां ऐसे ही चौराहे पर खड़ी होंगी. क्या इस तरह बचेंगी बेटियां? कुछ ने तो इस विचार की अभिव्यक्ति भी की. लेकिन उनके इस सवाल का जवाब वहां किसी के पास नहीं था.
कसूर किसका है? सरकार का, स्थानीय प्रशासन का या स्कूल वालों का. यह जानने के लिए कॉलेज की प्राचार्या रश्मि अस्थाना को फोन मिलाया, तो एक अलग ही कहानी सामने आई. मैडम को इस जागरूकता अभियान की पूरी जानकारी ही नहीं है. उन्होंने शहर से बाहर होने का हवाला देते हुए कुछ भी कहने से इनकार कर दिया.
यदि इन बेटियों में से किसी को गर्मी के कारण कुछ हो जाता है, तो इसका जिम्मेदार कौन होगा? जब राहगीर इन बेटियों से सवाल कर रहे थे, तब किसी शिक्षिका ने उत्तर क्यों नहीं दिया? जब मातृभूमि समाचार के पत्रकार ने इन बेटियों से बात की, तब कॉलेज के किसी बड़े व्यक्ति ने उत्तर क्यों नहीं दिया? संभव है कि कुछ बेटियों के साथ उनकी चिंता करने के लिए कोई बड़ा हो ही नहीं. ऐसे में यह मामला और गंभीर हो जाता है. न जाने एसी में बैठकर ऐसे अभियानों पर मौन रहने वाले किसी जिम्मेदार से कभी कोई उत्तर मिल भी पायेगा या नहीं
2022-05-30
