कानपुर
विश्व के पंचम मूल जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज जी की प्रचारिका सुश्री डॉ कुंजेश्वरी देवी जी ने त्रिभुवन पैलेस में चल रहे आध्यात्मिक प्रवचन के अष्टम दिवस पर भक्तो को बताया कि भक्ति ही ईश्वर प्राप्ति का सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। हमारे सभी शास्त्रों में यही बताया गया है कि एक मात्र भक्ति करने से ही जीव का कल्याण हो सकता है।
भक्ति से ही हमारे पाप करने की प्रवृत्ति नष्ट होती है। भक्ति ही हमारे अंतः करण को शुद्ध करती है। लेकिन मनुष्य को भगवान से निष्काम भक्ति करनी चाहिए। निष्काम भक्ति का अर्थ समझाया गया कि हम को भगवान से कुछ भी मांगना नहीं चाहिए। ये जो हम भगवान से संसार के समान मांगते है वास्तव में इसे भगवान की भक्ति नहीं कहते यह तो संसार की भक्ति है।
हमें तो भगवान के दर्शन की उनके शब्द स्पर्श रूप रस गंध की लालसा हृदय में पैदा करनी चाहिए।
भक्त प्रह्लाद के सामने जब नृसिंह भगवान का अवतार हुआ और उन्होंने प्रह्लाद से कहा वर मांगो तो भक्त प्रह्लाद ने भगवान से यही मांगा था कि यदि मेरे मस्तिष्क में कामना की कोई बीमारी हो तो उसे हमेशा हमेशा के लिए मिटा दीजिए। जबकि उसी प्रह्लाद के पिता ने अनेकों वर्ष एक अंगूठे पे खड़े होकर भगवान की तपस्या की वर मांगे परंतु परिणाम क्या हुआ हिरण्यकश्यपु मारा गया और प्रह्लाद को भगवत प्राप्ति हो गई।
तो भगवान से कुछ मांगने की मनुष्य में बुद्धि ही नहीं अतः भगवान से केवल और केवल भगवान को मांगना है भगवान का प्रेम मांगना है। इसलिए जीव को भगवान की निष्काम भक्ति करनी चाहिए।
प्रवचन के बाद सुमधुर संकीर्तन का भक्तो ने रसपान किया तत्पश्चात भोग आरती एवं प्रसाद वितरण का कार्य किया गया।
*राधे-राधे*
