रामचरितमानस में सिर विहीन राक्षस कंबध का वर्णन मिलता है।

 

कबन्ध एक गन्धर्व था जो कि दुर्वासा ऋषि के श्राप के कारण राक्षस बन गया था।

 

प्रभु श्रीराम ने उसका वध करके राक्षस योनि से उसका उद्धार किया। एक अन्य कथा के अनुसार यह “श्री” नामक अप्सरा का पुत्र था और विश्वावसु नाम का गंधर्व था। यह अत्यंत सुंदर बलशाली तथा इच्छा के अनुसार रूप धारण करने वाला था।

 

प्रभु श्री राम के द्वारा कबंध नामक राक्षस का वध

 

श्री राम और लक्ष्मण जब सीता माता को खोज रहे थे तो दंडक वन में उनका सामना अचानक एक विचित्र दानव से हुआ जिसका मस्तक और गला नहीं थे। उसकी केवल एक ही आंख ही नजर आ रही थी। वह विशालकाय और भयानक था। उस विचित्र दैत्य का नाम कबंध था।

 

कबंध ने राम-लक्ष्मण को एकसाथ पकड़ लिया। राम और लक्ष्मण ने कबंध की दोनों भुजाएं काट डालीं। कबंध ने भूमि पर गिरकर पूछा- आप कौन वीर हैं? परिचय जानकर कबंध बोला- यह मेरा भाग्य है कि आपने मुझे बंधन मुक्त कर दिया। कबंध ने कहा- मैं दनु का पुत्र कबंध बहुत पराक्रमी तथा सुंदर था। राक्षसों जैसी भीषण आकृति बनाकर मैं ऋषियों को डराया करता था इसीलिए मेरा यह हाल हो गया था।

 

ऋषि स्थूलशिरा ने कबंध को श्राप दिया था और कहा था कि जब श्री राम अपने भाई लक्ष्मण के साथ अपनी पत्नी को ढूंढने आएंगे तब वे तुम्हारी भुजाएं काट डालेंगे। तब वो ही तुम्हें श्राप मुक्त करेंगे।

 

कबंध कौन था

कबन्ध एक गन्धर्व था जो कि दुर्वासा ऋषि के श्राप के कारण राक्षस बन गया था। राम ने उसका वध करके राक्षस योनि से उसका उद्धार किया। एक अन्य कथा के अनुसार यह “श्री” नामक अप्सरा का पुत्र था और “विश्वावसु “नाम का गंधर्व था। यह अत्यंत सुंदर बलशाली तथा इच्छा के अनुसार रूप धारण करने वाला था। एक बार इसने बड़ा भयंकर रूप धारण करके स्थूलशिरा नामक ऋषि को बहुत परेशान किया तब उन्होंने इसे श्राप दे दिया कि तू इसी रूप में बना रहेगा। इसके बाद एक बार इंद्र ने इस पर वज्र का प्रहार किया जिससे इसका सिर पेट में घुस गया केवल कबंध अर्थात धड़ ही शेष रहा जिसके कारण इसका नाम कबन्ध पड़ा।

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