पुत्र के शरीर का आधा अंग दान में देने वाले दानवीर राजा मोरध्वज,

आपने वीरता और दानशीलता के कई किस्से और कहानियाँ सुनी होंगी, दानवीरता के बारे में सुनते ही महाभारत काल के वीर योद्धा कर्ण का नाम स्वाभाविक मन मे आ जाता है।

किन्तु कितनो को यह ज्ञात होगा कि कर्ण के समकालिक एक और महान योद्धा हुए जो कि परमदानी कहलाये और वो योद्धा है, हैहय वंशी राजा मोरध्वज जो कि कोसल राज्य के महाराज थे। इनकी राजधानी आरंग थी, जिसका नाम आधे अंग को आरे से काटे जाने के कारण “आरंग” पड़ा।

 

पौराणिक कथा के अनुसार महाभारत का युद्ध विजय करने के उपरांत पांडवो द्वारा अश्वमेघ यज्ञ का अनुष्ठान हुआ। उसमे एक अश्व को स्वतः विचरण करने के लिए छोड़ दिया जाता था और यदि उस अश्व को किसी ने पकड़ लिया तो यह इस बात को सिद्ध करता था कि वह व्यक्ति युद्ध करना चाहता है।

 

पांडवो द्वारा छोड़ा गया अश्व प्रतापी राजा मोरध्वज ने पकड़ लिया, तो अर्जुन क्रोधित हो उनके राज्य चढ़ाई करने के लिए उद्द्यत हुए। यह देख कर भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को रोका और कहा कि क्या तुम्हे पता है राजा मोरध्वज मेरे बहुत बड़े भक्त हैं, वो युधिष्ठिर के समान धर्मपालक भीम समान शक्तिशाली, तुम्हारे समान धनुर्धर नकुल समान सूंदर और सहदेव जैसी सहनशीलता युक्त हैं।

 

अर्जुन को भगवान की यह बात गले से न उतरी उसने कहा- प्रभु आप कह रहे है तो मैं यह मान लेता हूं परन्तु मुझे मोरध्वज के व्यक्तित्व का अनुभव स्वयं करना है। श्रीकृष्ण ने कहा ठीक है तो मैं जैसे बोलता हूं वैसा करना, प्रभु ने अपनी योगमाया से अर्जुन को सिंह और स्वयं को ब्राह्मण का वेश दे दिया, तदुपरांत दोनो मोरध्वज के दरबार मे जा पहुंचे।

 

महाराज उनके स्वागत सत्कार के लिए जैसे ही आये ब्राह्मण-रूपी श्रीकृष्ण ने जोर से कहा राजन मेरा यह सिंह बहुत दिनों से भूखा है इसे मांस चाहिए। मोरध्वज ने कहा इसे मैं भेड़-बकरी ला के दे देता हूं, तो ब्राह्मण ने हँसते हुए कहा कि मूर्ख यह कोई साधारण सिंह नही इसे केवल इंसान के दाहिने भाग का मांस ही चाहिए। मोरध्वज तत्काल आपने दाहिने भाग के अंग दान के लिए उद्यत हो उठे, तो ब्राम्हण ने कहा कि मेरे सिंह को तुम्हारे पुत्र के दाहिने अंग का मांस चाहिए। यह सुनके राजा और रानी भावुक हो उठे, तभी नन्हे राजकुमार ताम्रध्वज दरबार मे आये और कहा कि हे मुनिवर मैं अपना दाहिना अंग देने के लिए तत्पर हूँ, ब्राह्मण ने एक और शर्त रखी कि राजकुमार ताम्रध्वज के आधे अंग को काटने के लिए राजा और रानी दोनो को मिलके आरी चलानी होगी।

 

राजा मोरध्वज ने कहा आपकी आज्ञा शिरोधार्य है, आरी मंगवाई गयी और बालक ताम्रध्वज के सिर से लेके बीचोबीच बराबर दो भागों में विभाजित करना प्रारंभ हुआ तभी ब्राह्मण(श्रीकृष्ण) ने देखा कि ताम्रध्वज के बाएं भाग के आंख से आंसू बहने लगा है। इससे क्रुद्ध होकर ब्राह्मण ने कहा मुझे यह मांस स्वीकार नही जो रो के दिया जाए तब नन्हें राजकुमार ने कहा- “हे! ब्राह्मण देव मै रो नही रहा, यह तो मेरा बायां अंग रो रहा कि वो कितना अभागा है कि वो दाहिने अंग के समान आपके काम नही आ पा रहा है”।

 

ऐसा सुनते ही श्रीकृष्ण और अर्जुन अपने वास्तविक रूप में आ कर उन्हें दर्शन दिए तथा श्रीकृष्ण ने बालक के मस्तक पर अपना हाथ फिराया जिससे राजकुमार के अंग पुनः की भांति जुड़ गए, यह घटना जहाँ पे घटी वह आज आरंग नामक कस्बे के रूप में जाना जाता है जो कि राजधानी रायपुर से करीब 45 किमी की दूरी पर स्थित है, यह स्थान बहुत से कलात्मक तथा ऐतिहासिक धरोहरों को अपने आप में समाए हुए है।

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