पिता सूर्य ने अपने पुत्रों की योग्यतानुसार उन्हें विभिन्न लोकों का अधिपत्य प्रदान किया परंतु असंतुष्ट शनि ने उद्दंडता वश पिता की आज्ञा की अवेलना करते हुए दूसरे लोकों पर कब्जा कर लिया। सूर्य की प्रार्थना पर भगवान शंकर ने अपने गणों को शनि से युद्ध करने भेजा परंतु शनिदेव ने उनको परास्त कर दिया। इसके उपरांत भगवान शंकर व शनिदेव में भयंकर युद्ध हुआ। शनिदेव ने भगवान शंकर पर मारक दॄष्टि डाली तो भगवान शंकर ने तीसरा नेत्र खोलकर शनि व उनके सभी लोक का दमन कर शनि पर त्रिशुल का प्रहार कर दिया जिसके कारण शनिदेव संज्ञाशुन्य हो गए।

 

इसके पश्चात शनि को सबक सीखने हेतु महादेव ने उन्हे पीपल के पेड़ से 19 वर्षों तक उल्टा लटका दिया। इन्हीं 19 वर्षों तक शनि शिव उपासना में लीन रहे। इसी कारण शनि की महादश 19 वर्ष की होती है परंतु पुत्रमोह से ग्रस्त सूर्य ने महेश्वर से शनि का जीवदान मांगा। तब महेश्वर ने प्रसन्न होकर शनि को मुक्त कर उन्हें अपना शिष्य बनाकर संसार का दंडाधिकारी नियुक्त किया।

 

ब्रह्मपुराण के अनुसार शनि बाल्यकाल से ही कृष्ण भक्त थे। पिता सूर्यदेव ने चित्ररथ कन्या से इनका विवाह कर दिया था। विवाह उपरांत भी यह स्त्रीगमन से दूर रहे जिसके कारण शनि पत्नी ने क्रुद्ध होकर इनकी दृष्टि को शापित कर दिया। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार शनि की दृष्टि के कारण गणपती का स‌िर कटा व इसी कारण गणेश जी गजमुख कहलाए। मान्यतानुसार राजा विक्रमादित्य को क्रोधित शनि के कारण कष्ट झेलने पड़े। शनि ने ही राजा हरिशचंद्र को दर-दर की ठोकरें खिलाई। राजा नल व रानी दमयंती ने शनि के कारण जीवन में कई कष्ट सहे। शनि महादशा के कारण ही श्रीराम को वनवास हुआ व इसी कारण लंकापति रावण का वंश हनन हुआ। महाभारत में कुंती पुत्र पांडवों को राज्य से शनि के कारण ही भटकना पड़ा।

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