कानपुर

 

आठ दशक पुरानी परम्परा गंगा मेला के लिए शहर तैयार

 

 

आठ दशक पुरानी परम्परा गंगा मेला के लिए शहर तैयार

 

रज्जन बाबू मैदान से होगा शुभारंभ

अधिकारी और वरिष्ठ स्थानीय रहेंगे मौजूद

राष्ट्गान के बाद गाजे-बाजे के साथ चलेगा ठेला

गंगा मेला में फिर याद आयेगा ब्रिटिश शासन

 

कानपुर 84 साल पुरानी परम्परा का निर्वाहन करने के लिए एकबार फिर शहर तैयार है। सुबह दस बजे अधिकारी और वरिष्ठ स्थानीय लोगों के बीच गाजे-बाजे और हाथी घोड़े के साथ शहर भ्रमण के लिए ठेला सजकर निकलेगा। ठेले के साथ हजारों की संख्या में होरियारों होंगे। पूजा-पाठ और राष्ट्गान के बाद भ्रमण यात्रा प्रारंभ होगी।गंगा मेला का शुभारंभ पिछले आठ दशकों से इसी मैदान से हो रहा है। एकबार फिर परम्परा की शुरूआत इसी मैदान से कल यानी गुरूवार को होगी। रीति-रिवाज के बाद होरियारों के साथ भैंसा ठेला क्षेत्र भ्रमण के लिए निकलेगा।सुबह निकलने वाले भैंसा ठेला के साथ हाथी-घोड़ा भी मेला की शोभा बढ़ायेंगे। ऐतिहासिक मेले के स्वागत के लिए पूरा शहर तैयार रहेंगा। भ्रमण के दौरान होरियारों और ठेले पर सवार लोगों पर शहरवासी गुलाल और रंग फ़ेककर स्वागत करेंगे।हटिया से निकलने वाले भैंसा ठेला और होरियारों का काफिला शहर के हर क्षेत्र से यानी लगभग दस किलोमीटर का भ्रमण करेगा। हटिया से चलकर जनरलगंज, हाल्सीरोड, घंटाघर, किराना बाजार, शक्कर पट्टी, मेस्टनरोड, बिराहना रोड, फूलबाग सहित अन्य स्थानों से गुजरकर गंगा के किनारे समाप्त होगा।ठेला भ्रमण का शुभारंभ कराने वाले सेठ मुलचन्द्र थे। परिजनों के अनुसार, ब्रिटिस शासन के समय यहां होली खेलने में प्रतिबंध लगा दिया गया था। इतना हीं नहीं 42 क्रांतिकारियों को पकड़कर बंद कर दिया गया था। क्रांतिकारी के समर्थन में लोगों ने लगातार पांच दिन प्रदर्शन किया था। परेशान होकर ब्रिटिश शासन ने सभी को रिहा किया। इसी खुशी में सभी ने रंग गुलाल लगाकर खुशी का इजहार किया था।

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