कार्डियोलॉजी में अब इस हाईटेक विधि से होगा इलाज

 

उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े लक्ष्मीपति सिंघानिया कार्डियोलॉजी एवं कार्डियक सर्जरी संस्थान में आने वाले दिल के मरीजों के लिए अच्छी खबर है. अब उन्हें यहां दिल की अनियंत्रित धड़कनों का इलाज मिल सकेगा. कार्डियोलॉजी के निदेशक प्रोफेसर डॉ.राकेश वर्मा का कहना है कि PSVT (पैरोक्सिस्मल सुप्रावेंट्रिकुलर टैचीकार्डिया) नामक बीमारी में हृदय की गति अनियंत्रित हो जाती है. अभी तक इस बीमारी का इलाज यहां संभव नहीं था, लेकिन अब ऐसे मरीजों का इलाज यहां पर संभव हो सकेगा. इसमें दिल की धड़कन बढ़ने वाले रेशों को रेडियो फ्रीक्वेंसी एलिवेशन विधि के जरिए इलाज किया जाएगा.डॉ. राकेश वर्मा ने बताया कि PSVT के इलाज के लिए हमारे यहां पर अभी तक सेंटर डेवलप नहीं था. अभी तक हम इस दिशा में कोई काम भी नहीं कर रहे थे. हमारे यहां का एक स्टूडेंट इंग्लैंड में काफी अच्छा काम कर रहा है. यहां आयोजित कार्यशाला में हमने उसे बुलाया था. जिसमें उसके द्वारा हर चीज का बड़े ही साधारण तरीके से डॉक्टरों को प्रशिक्षण दिया गया. इस दौरान 6 से 7 रोगियों का उपचार भी किया गया. इसके बाद से डॉक्टरों में आत्मविश्वास जागा है और अब इस विधि के जरिए रोगियों का उपचार किया जाएगा.डॉ. राकेश वर्मा ने बताया कि हमारे हृदय में SSC फाइबर हो जाते हैं. ये बीमारी तब होती है जब गति के फाइबर होते हैं. निश्चित तौर पर हर दिल में सुनिश्चित होते हैं जैसे SA नोट, AV नोट, बंडल ऑफिस, राइट ओर लेफ्ट बंडल, लेकिन इसमें जब ये PSVT होता है तब एक या दो SSC फाइबर बन जाते हैं. मतलब एक्स्ट्रा फाइबर हृदय की गति को बढ़ा देते हैं. हमारी सामान्य हृदय गति 60 से 70 तक होती है. वह इसे दोगुना और तिगुना यानी 200 से 240 तक कर देते हैं. यह प्रक्रिया PSVT कहलाती है.डॉ. राकेश वर्मा बताते हैं कि Psvt जांच के लिए हम RF करते हैं. जिसे हम रेडियो फ्रीक्वेंसी एविलेशन कहते हैं. इसमें तीन नोट होते हैं. तीन जगह पर हम वायर को लगाते है. SA नोट, AV नोट और राइट बंडल के पास, फिर इसमें एक कैथिटल को मोरल आईटीएल मेल के जरिए डाला जाता है. फिर उसमें उसको वहां पर हिट दी जाती है और फिर उस फाइबर को खोज कर उस फाइबर को स्पॉट में जला दिया जाता है. जिससे हमारा SSC फाइबर गति को बढ़ा रहा होता है वह खत्म हो जाता है. इसके बाद दोबारा हम लोग फिर PSVT मरीज को करके देते हैं. अगर PSVT नहीं हुआ तो मतलब हमारा फाइबर पूरी तरह से जल गया है. इसके अलावा हम मौके पर यह भी चेक कर सकते हैं कि हमारा यह काम कितने प्रतिशत संपन्न हुआ.कार्डियोलॉजी के निदेशक प्रोफेसर डॉ. राकेश वर्मा के मुताबिक यह बीमारी ज्यादातर युवाओं में होती है और जब वह वृद्ध हो जाते हैं तो यह है आदत में आ जाती है. क्योंकि इस अवस्था में उन्हें हार्ट रेट पता नहीं चलती है. युवा इसे लेकर काफी ज्यादा पैनिक हो जाते हैं और तुरंत अस्पताल पहुंचते हैं. हमारे यहां पर रोजाना इस मर्ज के 8 रोगी इमरजेंसी वार्ड में आते है. यानी महीने में 200 से 250 रोगी अब इन रोगियों का इस विधि के जरिए इलाज किया जा सकेगा. इस उपचार के बाद रोगी की दवाओं पर निर्भरता भी काफी कम हो जाएगी.

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