पहलगाम में हुई आतंकवादी घटना के बाद भारत सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदमों के बीच में पूरे देश के कई शहरों में मॉक ड्रिल
पहलगाम में हुई आतंकवादी घटना के बाद भारत सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदमों के बीच में पूरे देश केपहलगाम में हुई आतंकवादी घटना के बाद भारत सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदमों के बीच में पूरे देश के कई शहरों में मॉक ड्रिल कई शहरों में मॉक ड्रिल कराए जाने के आदेश के पश्चात शहर की सभी सामाजिक संस्थाएं व सिविल डिफेंस समेत जिला प्रशासन सक्रिय हो उठा है। आज जहां डीएम ने प्रशासनिक व सेवा के अफसर के साथ बैठक कर मॉक ड्रिल का जायजा लिया तथा इस बात की समीक्षा की की किस तरह से मॉक ड्रिल के दौरान आम जनता को जागरूक किया जाए की कोई भी घटना या दुर्घटना होती है तो आम जनता अपना बचाव कैसे करें इस पर चर्चा की गई थी। वहीं लगभग 54-55 वर्ष पूर्व हुई मॉक ड्रिल की घटना को शहर के कुछ बुजुर्गों ने अखबार नवीसों से साझा किया। हुलागंज में रहने वाले शिवकुमार गुप्ता ने बताया कि मॉक ड्रिल के दौरान हम सभी तो छोटे-छोटे थे इस दौरान मां-आप सभी बच्चों को घर के अंदर कर देते थे और पूरा ब्लैकआउट कर दिया जाता था। शाम होते ही सायरन बजने लगता था और सभी परिजन अपना अपना काम समाप्त कर अपने घरों के अंदर आ जाते थे। दरवाजा में खिड़कियों में कागज चिपका दिए जाते थे ताकि कमरों की रोशनी बाहर न जाने पाए। क्योंकि रोशनी बाहर जाने से जंगी जहाजो को आभास हो सकता था कि यहां पर शहर है और वह बमबारी कर सकते थे। इसी तरह से व्यापारी राजेश गुप्ता ने बताया कि उस दौरान हम लोग काफी छोटे थे तो जिस समय सायरन बसता था।हम बच्चों की टोलियां बाहर निकाल करके लोगों को बताना शुरू करते थे कि आप लोग अपने-अपने घरों की लाइट बंद कर दें सभी लोग घरों के अंदर रहें ताकि दुश्मन देश के जहाज को हमारी उपस्थिति की जानकारी ना हो सके ।इसी तरह से प्रशासन ने जनता के सहयोग से गंगा की कटरी में जगह-जगह लाइट की व्यवस्था की थी ताकि अगर कोई जहाज आता है और बमबारी करता है तो वह बम गंगा में गिरकर बेकार हो जाएगा और शहर पूरी तरह से सुरक्षित रहेगा। व्यापारी रमेश सिंह शर्मा ने बताया कि सिविल डिफेंस द्वारा जगह-जगह पर लोगों को एकत्रित कर आग से बचाव के तरीके बताए जाते थे तथा दरवाजा की चौखटों पर कागज लगा दिया जाता था ताकि रोशनी किसी भी तरह से बाहर ना आ सके। फूल बाग स्थित सिविल डिफेंस कार्यालय के सामने आम जनता को अपने बचाओ के प्रशिक्षण भी दिए जाते थे।
