*मकर संक्रांति*
हिंदू धर्म में सूर्यदेवता से जुड़े कई प्रमुख त्योहारों को मनाने की परंपरा है। उन्हीं में से एक है मकर संक्राति। शीत ऋतु के पौस मास में जब भगवान भास्कर उत्तरायण होकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं तो सूर्य की इस संक्रांति को मकर संक्राति के रूप में देश भर में मनाया जाता है। वैसे तो मकर संक्रांति हर साल 14 जनवरी को मनाई जाती है, लेकिन पिछले कुछ साल से गणनाओं में आए कुछ परिवर्तन के कारण इसे 15 जनवरी को भी मनाया जाने लगा है।
शास्त्रों में मकर संक्रांति के दिन स्नान, ध्यान और दान का विशेष महत्व बताया गया है। पुराणों में मकर संक्रांति को देवताओं का दिन बताया गया है
मान्यता है कि इस दिन किया गया दान सौ गुना होकर वापस लौटता है।
इस दिन शुद्ध घी एवं कंबल का दान मोक्ष की प्राप्ति करवाता है। महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिये मकर संक्रांति का ही चयन किया था। मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जाकर मिली थीं।
श्रीमद्भागवत एवं देवी पुराण के मुताबिक, शनि महाराज का अपने पिता से वैर भाव था क्योंकि सूर्य देव ने उनकी माता छाया को अपनी दूसरी पत्नी संज्ञा के पुत्र यमराज से भेद-भाव करते देख लिया था, इस बात से नाराज होकर सूर्य देव ने संज्ञा और उनके पुत्र शनि को अपने से अलग कर दिया था। इससे शनि और छाया ने सूर्य देव को कुष्ठ रोग का शाप दे दिया था।
पिता सूर्यदेव को कुष्ट रोग से पीड़ित देखकर यमराज काफी दुखी हुए। यमराज ने सूर्यदेव को कुष्ठ रोग से मुक्त करवाने के लिए तपस्या की। लेकिन सूर्य ने क्रोधित होकर शनि महाराज के घर कुंभ जिसे शनि की राशि कहा जाता है उसे जला दिया। इससे शनि और उनकी माता छाया को कष्ठ भोगना पड़ रहा था। यमराज ने अपनी सौतली माता और भाई शनि को कष्ट में देखकर उनके कल्याण के लिए पिता सूर्य को काफी समझाया। तब जाकर सूर्य देव शनि के घर कुंभ में पहुंचे।
कुंभ राशि में सब कुछ जला हुआ था। उस समय शनि देव के पास तिल के अलावा कुछ नहीं था इसलिए उन्होंने काले तिल से सूर्य देव की पूजा की। शनि की पूजा से प्रसन्न होकर सूर्य देव ने शनि को आशीर्वाद दिया कि शनि का दूसरा घर मकर राशि मेरे आने पर धन धान्य से भर जाएगा। तिल के कारण ही शनि को उनका वैभव फिर से प्राप्त हुआ था। इसलिए शनि देव को तिल प्रिय है। इसी समय से मकर संक्राति पर तिल से सूर्य एवं शनि की पूजा का नियम शुरू हुआ।
हमारे गांव में मकर संक्रांति के दिन खिचडी का त्योहार मनाया जाता है। पूरे उल्लास के साथ संक्रांति के एक दिन पहले शाम को बड़ा व मुंगौड़ा तथा आलू ,गोभी,प्याज व बैगन के पकौड़े बनाये जाते हैं ,सब लोग खट्टी मोठी चटनी के साथ खाते हैं।
तिल के लडडू भी बनाये जाते हैं, फिर त्योहार के दिन सुबह जो जा पाता है वो गंगा स्नान करता है जो नही जा पाता वो घर मे ही स्नान करके खिचड़ी व फल दक्षिणा हाथ से स्पर्श करके दान करता है उसके बाद खिचड़ी में देशी घी,नींबू, अचार ,चटनी व दही बड़े के साथ सब लोग मिलकर खाते हैं।
शहरों में लोग खिचड़ी पर जगह जगह भंडारा करवाते हैं।
कुछ लीग खिचड़ी बंटवाते है और कुछ लोग चाय बंटवाते हैं।
बहुत सी समाजसेवी संस्थाएं कम्बल व ऊनी वस्त्र भी वितरित करवाती हैं।
कुछ पुराने लोग अभी भी गंगा किनारे जाकर कंडे जलाकर मिट्टी की मटकी में खिचड़ी बनाते हैं और परिवार व मित्रों के साथ वही बैठकर खाते भी हैं।
पर अब धीरे धीरे त्योहार भी मात्र दिखावा बनते जा रहे हैं।सोशल मीडिया के आ जाने से लोग दान का दिखावा भी बहुत करने लगे हैं, पर उससे कुछ लोगो का भला भी हो रहा है।
