वैसे तो शुद्ध सनातन में मान्यता है कि भगवान गणेश की पूजा सर्व प्रथम की जाती है जिनकी पूजा भगवान शिव और माता पार्वती भी करते हैं। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि आखिर जब भगवान गणेश माता पार्वती के पुत्र हैं तो फिर तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह पर भगवान गणेश की पूजा का वर्णन कैसे कर दिया। क्या तुलसी दास जी को ये मालूम नहीं था कि वो माता पार्वती के पुत्र हैं। फिर विवाह के वक्त वो कौन गणपति हैं जिनकी पूजा माता पार्वती और भगवान शिव के विवाह के वक्त की गई थी। तुलसीदास जी कहते हैं –

 

मुनि अनुशासन गनपति हि पूजेहु शंभु भवानी।

कोई सुने संशय करै जनि सुर अनादि जिय जानी।।

( अर्थात मुनियों के निर्देश पर शिव और पार्वती ने गणपति की पूजा की। कोई इस पर संशय नहीं करे क्योंकि गणपति तो अनादि हैं)

 

अर्थात गणपति भगवान शिव और पार्वती के पुत्र तो बाद में हुए । जिन गणेश को हम माता पार्वती के पुत्र मानते हैं वो स्वयं अनादि और अनंत हैं। माता पार्वती के रुप में तो गणपति ने अवतार लिया था। तभी तो ऋग्वेद , यजुर्वेद और अर्थववेद में भी गणपति की वंदना की गई है जबकि माता पार्वती का उल्लेख इन वेदों में नहीं है। ऐसी मान्यता है कि पार्वती पुत्र गणेश भगवान विष्णु के ही अवतार हैं। माना जाता है कि माता पार्वती ने पुण्यक नामक व्रत किया था जिससे भगवान विष्णु पुत्र के रुप में गणेश बन कर आए। गणेश तो वैदिक देवता हैं जिनकी वंदना बार बार की गई है। वेदों में गणेश जी का नाम गणपति या ब्रह्म्मस्पति है।वही पौराणिक कथाओं में माता पार्वती के पुत्र गणेश के रुप में दिखाई देते हैं। वेदों में गणपति की वंदना कुछ इस प्रकार है-

 

गणानां त्वां गणपतिं हवामहे, प्रियाणां त्वां प्रियपतिं हवामहे।

निधीनां त्वा निधिपति हवामहे वसो मम, आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम्।।

( हे गणपति आप सृष्टि के निर्माता हैं , गणो के पति हैं, समस्त निधियों के स्वामी और प्रकृति के स्वामी हैं)

 

गणपति को वेदों में ज्येष्ठराजं भी कहा गया है अर्थात सभी देवी देवताओं में सबसे प्रथम । गणपति ही पौराणिक कथाओं में माता पार्वती के तन से उत्पन्न बताया गया है। इसी वजह से उन्हें उमासुतं और पार्वतीतनय भी कहा गया है। भगवान शिव के द्वारा उनके सिर को काटने और बाद में हाथी के बच्चे का सिर लगाने की कथा भी प्रसिद्ध हुई । ऐसी भी मान्यता है कि गणेश जी का सिर शनि की कुदृष्टि के फलस्वरुप कट गया था। शुद्ध सनातन में पौराणिक कथाओं और वैदिक ऋचाओ के सही अन्वेषण से ही हमें गणति और गणेश जी के बीच अंतर का रहस्य मालूम हो सकता है।

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