राम-कृष्ण ने भी की शिव आराधना

श्रीराम व श्रीकृष्ण ने जब से सृष्टि की रचना हुई है तब से भगवान शिव की आराधना व उनकी महिमा की कई कथाएं हैं। स्वयं भगवान श्रीराम व श्रीकृष्ण ने भी अपने कार्यों की बाधारहित सिद्धि के लिए उनकी साधना की और शिवजी के शरणागत हुए। श्रीराम ने लंका विजय के पूर्व भगवान शिव की आराधना की।

महाशिवरात्रि का महत्व

माना जाता है कि मां पार्वती ने कठिन तपस्या कर भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न् किया और शिवरात्रि के दिन ही माता पार्वती व शिव की शादी हुई थी। इसलिए रात्रि में शिवजी की बारात निकाली जाती है।

विवाहोत्सव के उपलक्ष्य में रात्रि जागरण और शिव विवाह देखने व प्रात:काल भोर में मंगला आरती देखने से कोटि-कोटि पुण्य का फल प्राप्त होता है, ऐसा वेदों व शास्त्रों में उल्लेख है।संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी ने मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के मुखारविन्द से कहलवाया है कि ‘शिवद्रोही मम दास कहावा, सो नर सपनेहु मोहि नहिं भावा’ अर्थात जो शिव का द्रोह करके मुझे प्राप्त करना चाहता है वह सपने में भी मुझे प्राप्त नहीं कर सकता।

पौराणिक मान्यता है कि एक बार पार्वती जी ने भगवान शिव से पूछा, ऐसा कौन-सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्युलोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं? शिवजी ने पार्वती को शिवरात्रि के व्रत का उपाय बताया। यह अपनी आत्मा को पुनीत करने का महाव्रत है। इस व्रत को करने से सब पापों का नाश हो जाता है। हिंसक प्रवृत्ति बदल जाती है।

निरीह जीवों के प्रति मन में दया भाव उपजता है। शिवरात्रि पर सच्चा उपवास यही है कि हम परमात्मा शिव से बुद्धि योग लगाकर उनके समीप रहें। उपवास का अर्थ ही है समीप रहना। जागरण का सच्चा अर्थ भी काम, क्रोध आदि पांच विकारों के वशीभूत होकर अज्ञान रूपी कुम्भकरण की निद्रा में सो जाने से स्वयं को सदा बचाए रखना है।

चतुर्दशी तिथि के स्वामी हैं शिव

चतुर्दशी तिथि के स्वामी शिव हैं। सूर्यदेव भी इस समय तक उत्तरायण में आ चुके होते हैं। चंद्रमा अपनी क्षीणस्थ अवस्था में पहुंच जाते हैं। इसके चलते बलहीन चंद्रमा सृष्टि को ऊर्जा देने में असमर्थ हो जाते हैं। चंद्रमा का सीधा संबंध मन से कहा गया है। अब मन कमजोर होने पर भौतिक संताप प्राणी को घेर लेते हैं तथा विषाद की स्थिति उत्पन्न् होती है।

 

जिससे कष्टों का सामना करना पड़ता है। चंद्रमा शिव के मस्तक पर सुशोभित है। अत: चंद्रदेव की कृपा प्राप्त करने के लिए भगवान शिव का आश्रय लिया जाता है। इसीलिए इसे परम शुभफलदायी कहा गया है।

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